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________________ श्रावक के धन का सदुपयोग जिनागम में योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक ११९ महाभाग्यशाली है। राजा आदि कोई महासंपन्न व्यक्ति जिनमंदिर बनवाये तो उसके साथ उसके निर्वाह और भक्ति के लिए | बहुत सा भंडार, धन, गांव, शहर या गोकुल आदि का दान देना चाहिए। __ इस तरह जिनमंदिर रूपी क्षेत्र में अपना धन लगाना चाहिए तथा कोई मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो गया हो तो उसका जीर्णोद्धार भी कराना चाहिए। नष्ट या भ्रष्ट भी हो तो उसका उद्धार कराना चाहिए। यहां शंका करते हैं कि निरवद्य=पाप रहित जिनधर्म के आराधक चतुर श्रावक के लिए जिन मंदिर या जिनप्रतिमा, बनवाना या जिनपूजा आदि करना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा करने में षड्जीवनिकाय के जीवों की विराधना होती है। जमीन खोदना, पत्थर फोड़ना, ईंट बनाना, खड़े भरना, ईंटे आदि इकट्ठी करना, जल से उन्हें गीली करना; इन सब कार्यों में पृथ्वीकाय, अपकाय, (तेउकाय - वायुकाय) वनस्पतिकाय एवं त्रसकाय आदि जीवों की विराधना होगी। अतः जीवहिंसा किये बिना जिन-मंदिर बन नहीं | सकता! इसका उत्तर देते हैं-जो श्रावक अपने लिये या कुटुंब के लिए आरंभ-परिग्रह में आसक्त बनकर धनोपार्जन करता है, उसका धनोपार्जन करना निष्फल न हो, इसलिए जिन-मंदिर आदि बनवाने में धन का सदुपयोग करना कल्याण के लिए होता है। इसीके समर्थन में कहते हैं-धर्म के लिए धन का उपार्जन करना यक्त नहीं है। इसी दष्टि से क धर्म के लिए धन कमाने की इच्छा करने से बेहतर यही है कि उसकी इच्छा नहीं करे। क्योंकि कीचड़ में पैर बिगाड़कर फिर उसे धोने की अपेक्षा पहले से कीचड़ का स्पर्श नहीं करना ही उत्तम है। दूसरी बात, जिनमंदिर आदि बनवाना, बावडी कुएँ, तालाब आदि खुदवाने के समान अशुभकर्म-बंधन का कारण नहीं है, बल्कि वहां चतुर्विध श्रीसंघ का बारबार आगमन, धर्मोपदेश-श्रवण, व्रतपरिपालन आदि धर्मकार्य संपन्न होंगे. जो शभ कर्म-पण्य रूप या निर्जरा रूप है। इस स्थान पर छह जीवनिकाय की विराधना होने पर भी यतना रखने वाले श्रावक के दया के परिणाम होने से सूक्ष्मजीवों का रक्षण होने से उसे विराधना-संबंधी पापबंधन नहीं होता। कहा है कि शुद्ध अध्यवसाय वाले और सूत्र में कही हुई विधि के अनुसार धर्ममार्ग का आचरण करने वाले यतनावान् श्रावक द्वारा जीवविराधना हो तो भी वह कार्य निर्जरा-रूप फल देने वाला होता है। समस्त गणिपटिक अर्थात् द्वादशांगी का सार जिन्होंने प्राप्त कर लिया है, उन निश्चयनयावलंबी परमर्षियों का कथन है कि 'आत्मा के जैसे परिणाम होते हैं, तदनुसार ही फल मिलता है बाह्यक्रिया के अनसार नहीं। इसका अर्थ यह हआ कि जिनमंदिर-निर्माण आदि कार्यों के पीछे निश्चयनय की दृष्टि से हिंसा के परिणाम नहीं है, अपितु भक्ति के परिणाम है। श्रावक-प्रतिमा अंगीकार करने वाला महाश्रावक, जो अपने कुटुंब | के लिए भी आरंभ नहीं करता, वह भी यदि जिनमंदिर आदि बनाता है, तो उसको छह जीव-निकाय की विराधना से | पापकर्म का बंध नहीं होता। और जो यह कहा जाता है कि जैसे शरीर आदि के कारणों से छह जीवनिकाय का वध होता है, वैसे ही उसे जिनमंदिर निर्माण या जिन-पूजा में भी छह जीव-निकाय का वध होता है; (पंचा. ४/४५) ऐसा कथन | अज्ञता का सूचक है। अधिक विस्तार से क्या लाभ? ३. जिन-आगम – तीसरा क्षेत्र जिन-आगम है। इस क्षेत्र में भी श्रावक को धन लगाना चाहिए। क्योंकि | मिथ्याशास्त्र से उत्पन्न गलत संस्कार रूपी विष का नाश करने के लिए मंत्र के समान; धर्म-अधर्म, कृत्य-अकृत्य, भक्ष्य अभक्ष्य, पेय-अपेय, गम्य-अगम्य, तत्त्व-अतत्त्व आदि बातों में हेयोपादेय का विवेक कराने वाला, गाढ अज्ञानांधकार | में दीपक समान, संसारसमुद्र में डूबते हुए के लिए द्वीप समान, मरुभूमि में कल्पवृक्ष के समान जिनागम इस संसार में | प्राप्त होना अतिदुर्लभ है। श्री जिनेश्वर देव के स्वरूप, उनके सिद्धांतों और उपदेशों का ज्ञान कराने वाला आगम ही है। स्तुति में ऐसा ही कहा है कि जिसको अपने सम्यक्त्व-सामर्थ्य से आप जैसे वीतराग पुरुषों का परम आप्तभाव प्राप्त है, हम समझते हैं, ऐसा जो कुवासना रूप दोषों का नाश करने वाला आपका शासन है; आपके उस शासन को मेरा नमस्कार हो। जिनागम के प्रति प्रगाढ़ सम्मान रखने वाले व्यक्ति को देव, गुरु और धर्म आदि पर बहुमान होता है; इतना ही नहीं, बल्कि किसी समय केवलज्ञान से भी बढ़कर जिनागम-प्रमाण रूप ज्ञान हो जाता है। उसके लिए शास्त्र में कहा है कि सामान्य श्रुतोपयोग के अनुसार श्रुतज्ञानी कदाचित् दोषयुक्त (अशुद्ध) आहार को भी निर्दोष (शुद्ध) मानकर ले आये, तो उसे केवलज्ञानी भी आहार रूप में ग्रहण कर लेते हैं, नहीं तो, श्रुतज्ञान अप्रमाण हो जाय। (पि. नि. ५२४) श्रीजिनागम का वचन भी भव्यजीवों का भव (संसार) नाश करने वाला है। इसलिए कहा है कि सुनते हैं, जिनागम का 248
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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