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________________ श्रमणोपासक की आहार वहोराने की विधि योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक ८७ होने से वह वर्जित है। रजोहरण तो प्रत्यक्ष जीवरक्षा के लिए प्रतिलेखना करने में उपयोगी होने से उसके रखने में तो कोई विवाद ही नहीं कर सकता। मुखवस्त्रिका यानी 'मुहपत्ती' भी उड़ने वाले (संपातिम) जीवों से बचाव के लिए (रक्षार्थ) और मुंह से निकलती हुई गर्म हवा से बाहर के वायुकायिक जीवों की रक्षा के लिए तथा मुख में रजकण आदि का प्रवेश रोकने के लिए उपयोगी है। पट्टे और चौकी इसलिए उपयोगी है कि वर्षाकाल में नीलण-फूलण, कुंथुआ आदि |संसक्त जीवों से युक्त जमीन पर शयन करने का निषेध होने से पट्ट, चौकी आदि पर सोना-बैठना उपयोगी है। शीतक और ग्रीष्मकाल में शय्यासंस्तारक (आसन) आदि शयन के लिए उपयोगी होते हैं। वसति (मकान) या उपाश्रय आदि में निवासस्थान भी साधु के संयमपालन के लिए अत्यंत उपकारी है। 'जो भाग्यशाली अनेकगुणधारक मुनिवरों को ठहरने के लिए मकान (वसति), उपाश्रय आदि देता है, समझ लो, उसने अन्न, पानी, वस्त्र, शयन, आसन आदि सब कुछ दे दिया है। जहां रहकर सभी मुनिगण उस वसति (मकान) का उपयोग करते हैं, उस उपाश्रय में अपनी एवं अपने चारित्र की भी सुरक्षा होती है, उसमें ज्ञान, ध्यान आदि की साधना सुकर होती है। इस कारण से वसति (मकान) देने वाले ने सब कुछ दे दिया, ऐसा माना जाता है। सर्दी, गर्मी, चोर, डांस, मच्छर, वर्षा आदि से मुनियों की सुरक्षा करने वाला स्वर्गसुख को हस्तगत कर लेता है। इस प्रकार दूसरे भी अधिक और औपग्रहिक धर्मोपकरणों के रखने में मुनियों को दोष नहीं है। उनके दाता को एकांत रूप से लाभ ही है। उपकरणों की संख्या-मर्यादा बताते हैं-'जिनकल्पी के लिए १२ प्रकार के, स्थविरकल्पीमुनि के लिए १४ प्रकार के और आर्या (साध्वी) के लिए २५ प्रकार के उपकरण रखने की अनुज्ञा दी है। इससे अधिक रखना उपग्रह कहलाता है। (ओ. नि. ६७१) यह सारी बात पिंडनियुक्ति और औघनियुक्ति आदि आगमों से जान लेना। यहां ग्रंथ विस्तृत हो जाने के भय से इतना ही कहकर लेखनी को विराम देते हैं।' यहां वृद्धों (स्थविरों) द्वारा उक्त सामाचारी (श्रावक की आचारसंहिता) बताते हैं-'श्रावकों को पौषध पारित (पूर्ण) करके पारणा करने से पहले साधु-साध्वी विराजमान हों तो उन्हें पहले अवश्य निमंत्रित कर वहोराना चाहिए, फिर आहार करना चाहिए। उसकी विधि यह है कि जब अपने भोजन का समय हो तब वस्त्रादि से अच्छी तरह सुसज्जित होकर उपाश्रय में जाकर साधुओं को आहारपानी का लाभ देने के लिए विनति करे। उस समय साधु की क्या मर्यादा है? यह बताते हैं-एक साधु पल्ले (पडले) का शीघ्र प्रतिलेखन करे, दूसरा मुखवस्त्रिका का और तीसरा पात्रों का झटपट प्रतिलेखन करे; जिससे पौषधोपवासी श्रावक को पारणे में विलंब या अंतराय न हो। अथवा साधुओं के निमित्त से | स्थापनादोष न लग जाय, इसकी सावधानी रखे। यदि श्रावक प्रथम प्रहर (पौरसी) में आहार के लिए प्रार्थना करता हो और साधु के नौकारसी तक के प्रत्याख्यान हो तो आहार ग्रहण कर ले, यदि नौकारसी तक प्रत्याख्यान न हो किन्तु पौरसी तक के हो तो ग्रहण न करे; क्योंकि उस आहार को संभालकर रखना पड़ेगा। यदि श्रावक बहुत जोर देकर विनति करता है तो आहार लेकर उसे स्थान पर लाकर अच्छी तरह संभालकर रख दे और जो साधु पौरसी (एक प्रहर तक) प्रत्याख्यान पूरा होते ही पारना करने वाला हो उसे वह आहार दे दे, अथवा दूसरे साधु को दे दे। साधु भिक्षा के लिए जाने से पूर्व पात्र, पल्ले आदि का प्रतिलेखन कर ले। भिक्षा के लिए कम से कम दो साधु जाएँ, अकेले साधु का भिक्षार्थ जाना उचित नहीं। मार्ग में श्रावक साधु के आगे-आगे चले; और वह साधु को अपने घर ले जाएँ। वहां साधुओं को आसन ग्रहण करने की प्रार्थना करे; यदि वे बैठे तो ठीक है, न बैठे तो भी विनय का आचरण-व्यवहार करना और जानना चाहिए। साधु मुनिराज के घर पधार जाने पर श्रावक स्वयं अपने हाथ से उन्हें आहार पानी देकर लाभ ले। यदि |घर में दूसरा कोई आहार दे रहा हो तो स्वयं आहार का बर्तन लेकर तब तक खड़ा रहे; जब तक गुरुदेव आहार न | लें। साधु को भी चाहिए कि भिक्षा में पश्चात्कर्म-अर्थात् बाद में दोष न लगे, इसलिए गृहस्थ के बर्तन में सारी की सारी वस्तु न ले; कुछ शेष रखे। उसके बाद गुरुओं को वंदन करके कुछ कदम तक उनके साथ चलकर उन्हें पहुंचाकर आये, फिर स्वयं भोजन करे। यदि उस गांव में साधुमुनिराज का योग न होतो भोजन के समय साधुमुनिराजों के आने की दिशा में दृष्टि करे और विशुद्धभाव से चिंतन करे कि 'यदि साधु-भगवंत होते तो मैं उन्हें आहार देकर कृतार्थ होता/ होती।' यह पौषध को पारित (पूर्ण) करने की विधि है। अगर पौषध न किया हो तो भी सुज्ञश्रावक-श्राविका प्रतिदिन साधुसाध्वियों को कुछ न कुछ दान देकर फिर भोजन करते हैं। अथवा भोजन करने के बाद भी दान देते हैं। इस संबंध में कुछ श्लोक हैं, जिनका अर्थ यहां प्रस्तुत किया जाता है 218
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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