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________________ चुलनी पिता की कथा योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक ८६ अन्य सागों का, १८. इमली और कोकम के सिवाय अन्य सभी खटाईयों का, १९. वर्षाजल के अलावा अन्य पेयजल का, २०. पांच प्रकार के द्रव्यों से सुगंधित तांबूल के सिवाय अन्य मुखवास का त्याग किया। इसके बाद उसने आर्तध्यान रौद्रध्यान, हिंसा के उपकरणप्रदान, प्रमादाचरण, पापकर्मोपदेश या प्रेरणा; इन पंचविध अनर्थदंडों का त्याग किया। चार शिक्षाव्रत भी अंगीकार किये। इस प्रकार भगवान महावीर से सम्यक्त्वसहित समस्त-अतिचार रहित श्रावकव्रत सम्यक् प्रकार से ग्रहण किये और भगवान् को नमस्कार करके वह अपने घर गया। वहां अपनी धर्मपत्नी से भी उसने खुद ने अंगीकार किये हुए श्रावकधर्म का जिक्र किया। पत्नी ने भी उन श्रावकव्रतों को ग्रहण करने की इच्छा से अपने पति चुलनीपिता से आज्ञा मांगी। पति की आज्ञा पाकर श्यामा उसी समय धर्मरथ में बैठकर भगवान् की सेवा में पहुंची और उसने भी प्रभु को वंदना-नमस्कार करके श्रावकधर्म के व्रत ग्रहण किये। उसके चले जाने के बाद गणधर गौतम स्वामी ने भगवान् महावीर से नमस्कार करके विनय पूर्वक पूछा-'प्रभो! क्या यह चुलनीपिता अनगारधर्म को स्वीकार करेगा?' भगवान् ने कहा-'यह अनगारधर्म को अंगीकार नहीं करेगा। परंतु श्रावकधर्म में ही तल्लीन होकर आयुष्य पूर्ण होने पर मरकर सौधर्म देवलोक में उत्पन्न होगा। वहां अरुणाभविमान में चार पल्योपम की स्थिति वाला देव बनेगा। और वहां से च्यव करके यह महाविदेहक्षेत्र में मनुष्य जन्म पाकर निर्वाणपद को प्राप्त करेगा। जीवन के संध्याकाल में चुलनीपिता ने अपने ज्येष्ठपुत्र को घर और परिवार का सारा भार सौंप दिया और स्वयं निवृत्त होकर धर्मध्यान में रत रहने लगा। एक बार चुलनीपिता पौषधशाला में पौषधव्रत लेकर आत्मचिंतन में लीन था। उस दौरान एक मायावी मिथ्यात्वी देव रात के समय परीक्षा की दृष्टि से उसके पास आया और विकराल रूप बनाकर हाथ में नंगी तलवार लिये गर्जती हुई भयंकर आवाज में कहने लगा-'अरे! अनिष्टक याचक श्रावक! तूने यह क्या धर्म का ढोंगकर रखा है? मैं आदेश देता हूं-श्रावक व्रत का यह दंभ छोड़ दे! अगर तूं इसे नहीं छोड़ेगा, तो तेरे इस तलवार से तेरे बड़े लड़के के कुंहड़े के समान टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा। और तेरे देखते ही देखते. उसके। मांस के टुकड़े खौलते हुए तेल में डालकर तलूंगा और उसी क्षण शूल में बींधकर उन्हें खाऊंगा। तथा उसका खून | भी तेरे सामने ही पीऊंगा। जिसे देखकर तं स्वयं अपने प्राण छोड देगा। 'देव की इस प्रकार की भयंकर ललकार सनकर भी बादलों की गड़गड़ाहट एवं गर्जनतर्जन से जैसे सिंह कंपायमान नहीं होता, वैसे चुलनीपिता भी देव की सिंहगर्जना भीत नहीं हआ। चलनीपिता को अडोल देखकर बार-बार डरावनी सरत बनाकर डराने के लिए धर्मक्रिया में बाधा देता रहा, मगर चुलनीपिता ने देव के सामने देखा तक नहीं, जैसे भौंकते हुए कुत्ते के सामने थी नहीं देखता। इसके बाद निर्दय क्रूरात्मा देव ने कृत्रिम रूप से बनाये हुए चुलनीपिता के बड़े पुत्र को उसके सामने पशु की तरह तलवार से काट डाला। और फिर उसके टुकड़े-टुकड़े करके धधकते हुए तेल की कड़ाही में डाल दिये। कुछ टुकड़े तवे पर सेकने लगा। जब वे पक गये तो उन्हें तीखे शूल से बींधकर वह देव खाने लगा। तत्त्वज्ञ चुलनीपिता ने यह सारा उपसर्ग (कष्ट) समभाव से सहन किया। सच है, अन्यत्वभावना के धनी आत्माओं को अपने अंग को काट डालने पर जरा भी व्यथा नहीं होती। देव ने देखा कि यह मेरे प्रयोग से जरा भी विचलित न हुआ, तब उसने दूसरा दाव फेंका। देव ने धमकी देते हुए कहा-'देख! अब भी मान जा मेरी बात और छोड़ दे इस धर्म के पाखंड को! क्या धरा है इस प्रकार व्यर्थ कष्ट सहने में? इतने पर भी अगर तं यह व्रत नहीं छोड़ेगा तो फिर मैं तेरे मझले पुत्र को भी तेरे बड़े पुत्र की तरह खत्म कर दूंगा।' यों कहकर पहले की तरह मझले पुत्र को भी काटा और बार-बार उसके | सम्मुख क्रूर अट्टहास्य करने लगा, मगर इससे भी चुलनीपिता क्षुब्ध नहीं हुआ। फिर दांत किटकिटाते हुए देव ने अपने वाक्य दोहराए और उसके छोटे पुत्र को भी तलवार से उड़ा दिया। किन्तु फिर भी अविचल देखकर देव का क्रोध दुगुना हो गया। देव ने फिर चुनौती देते हुए कहा-'अरे धर्म के ढोंगी! अब भी तूं अपना पाखंड नहीं छोड़गा तो देख ले! तेरे सामने ही तेरी माता की भी वही गति करूंगा।' फिर उसने चुलनीपिता की माता भद्रा की-सी हुबहु प्रतिकृति बनाकर रुग्णदशा से पीड़ित, दीन-हीन, मलिनमुखी रोती हुई करुण हिरनी के समान उसे बताते हुए कहा-'इस व्रत को तिलांजलि दे दे! यह व्रत तेरे परिवार के प्राणनाश का परवाना लेकर आया है! क्या तूं इतना भी नहीं समझता कि 214
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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