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________________ आर्त्तरौद्रध्यान का स्वरूप और पापोपदेशरूप अनर्थदंड योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक ७४ से ७५ ।२४५। शरीराद्यर्थदण्डस्य, प्रतिपक्षतया स्थितः । योऽनर्थदण्डस्तत्त्यागस्तृतीयं तु गुणव्रतम् ||७४|| अर्थ :आर्त्त-रौद्रध्यान रूप अपध्यान करना, पापजनक कार्य का उपदेश या प्रेरणा देना, हिंसा के साधन दूसरों को देना, प्रमादाचरण करना; यह चार प्रकार का अनर्थदंड कहलाता है। शरीर आदि के लिए जो आरंभ या सावद्य प्रवृत्ति अनिवार्य रूप से करनी पड़े; वह अर्थदंड है; लेकिन जिसमें अपना या पराया किसी का भी सिवाय हानि के कोई लाभ नहीं, जिस पाप से अकारण ही आत्मा दंडित हो, वह अनर्थदंड है। उसका त्याग करना ही तीसरा गुणव्रत कहलाता है ।।७३-७४ ।। व्याख्या :- बुरा ध्यान करना अनर्थदंड का प्रथम प्रकार है। उसके दो भेद हैं- आर्त्तध्यान और रौद्र - ध्यान । आर्त्तध्यान - ऋत। अर्थात् दुःख से उत्पन्न होने वाला आर्त्त कहलाता है अथवा आर्त्ति यानी पीड़ा या यातना, | उससे होने वाला ध्यान आर्त्तध्यान है । (ध्यान शतक ६-१० ) इसके ४ प्रकार हैं - १. अप्रिय शब्द आदि विषयों का संयोग | होने पर राग से मलिन जीव द्वारा उसके अत्यंत वियोग की चिंता करना; साथ ही उसका फिर संयोग न हो, इस प्रकार का विचार करना। २. पेट में शूल (पीड़ा), मस्तक में वेदना या शरीर के किसी अंग में पीड़ा होने पर हायतोबा मचाना, छटपटाना, उसके वियोग के संबंध में बार-बार तीव्रता से चिंतन करना। उसका पुनः संयोग न हो, इसकी चिंता करना तथा उसके प्रतिकार के लिए चित्त व्याकुल हो जाना। ३. ईष्ट - शब्दादि विषयों तथा सातावेदनीय के कारण अनुकूल | विषयसुख के प्राप्त होने पर उनमें गाढ़ आसक्ति (राग) रखकर उनका कभी वियोग न हो, बार-बार संयोग मिलता जाय; | इस प्रकार की अभिलाषा करना । ४. इंद्र, चक्रवर्ती आदि के वैभव, रूप अथवा सुख आदि की प्रार्थना रूप निदान करना अथवा अदृष्ट, अश्रुत या अज्ञात वस्तु की प्राप्ति के लिए छटपटाना तथा उसका अधम चिंतन करते हुए निदान करना । | ये चारों प्रकार के आर्त्तध्यान राग, द्वेष, मोह और अज्ञान से युक्त जीवों को होते हैं। आर्त्तध्यान जन्म-मरण के चक्र रूपी | संसार को बढ़ाने वाला और तियंचगति में ले जाने वाला है। रौद्रध्यान - रौद्र का अर्थ भयंकर है। जो भयंकर दुर्भाव या भयंकर कर्म दूसरों को रुलाने और दुःखी करने का | कारण है, उसे रौद्रध्यान कहते हैं। रौद्रध्यान भी चार प्रकार का है - १. हिंसानुबंधी, २. मृषानुबंधी, ३. स्तेयानुबंधी और ४. संरक्षणानुबंधी। (अ) जीवों का वध करने, बंधन में डालने, जलाने, मारने-पीटने तोड़-फोड़, दंगे आदि करने का | या इसी प्रकार का हिंसाविषयक षड्यंत्र मन में रचना, कोई ऐसी हिंसक योजना मन में बनाना, क्रूरतापूर्वक पूर्वोक्त बातों का चिंतन करना; प्रथम हिंसानुबंधी रौद्रध्यान है। ऐसा रौद्रध्यानी अत्यंत क्रूर, अतिक्रोधी, निर्दयचित्त एवं अधमपरिणामी होता है। (आ) किसी दूसरे पर झूठा आरोप ( कलंक) लगाना, किसी को चकमा देने, अपने मायाजाल में फंसाने, धोखा देने, झूठ बोलने, दूसरे की चुगली खाने, वादा भंग करने, प्रतिज्ञा तोड़ने, झूठा प्रपंच रचने आदि की उधेड़बुन या | खटपट में लगा रहना, इसी प्रकार का रात-दिन चिंतन करना मृषानुबंधी नामक दूसरा रौद्रध्यान है। ऐसा रौद्रध्यानकर्ता मायावी, धोखेबाज व गुप्त पापकर्मा होता है। (इ) तीव्र लोभ एवं तृष्णा से व्याकुल होकर दूसरों का धन हड़पने, छीनने, दूसरे की जमीन-जायदाद अपने कब्जे में करने, चोरी करने, डाका डालने, लूट खसोट करने, अधिक पैसा प्राप्त हो, इस प्रकार की अनैतिक तरकीबें सोचने | या इस प्रकार के नये-नये चोरी के नुसखे अजमाने के चिंतन में डूबा रहना; तीसरा स्तेयानुबंधी रौद्रध्यान है। ऐसा व्यक्ति भी क्रूरपरिणामी, अतिलोभी, द्रव्यहरण में दत्तचित्त एवं परलोक में पाप के परिणाम से निःशंक होता है। (ई) शब्दादि विषयों या साधनों तथा धन के हरण की प्रतिक्षण शंका से ग्रस्त होकर धन कैसे जमा रहे; सरकार, हिस्सेदार या अन्य लोगों को चकमा देकर कैसे धन या साधनों की रक्षा की जाय ? इस प्रकार की चिंता में अहर्निश मग्न | व्यक्ति संरक्षणानुबंधी रौद्रध्यानी है। ऐसा व्यक्ति धन ले जाने या खर्चकर देने वाले व्यक्ति को मार डालने तक क्रूर | विचारकर लेता है। ये चारों प्रकार के रौद्रध्यान, राग, द्वेष और मोह के विकार से ग्रस्त जीव को होते हैं, ये संसारवृद्धि | करने वाले और नरक में ले जाने वाले हैं। (ध्यान शतक १८ - २४) यह आर्त्तरौद्रध्यान रूपी अपध्यान अनर्थदंड का प्रथम 205
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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