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________________ उदुंबर, अनंतकाय आदि का विवरण योगशास्त्र तृतीय प्रकाश श्लोक ३० से ४३ ।२०९। एकैक-कुसुमक्रोड़ाद् रसमापीय मक्षिकाः । यद्वमन्ति मधूच्छिष्टं, तदश्नन्ति न धार्मिकाः ॥३८।। अर्थ :- एक-एक फूल पर बैठकर उसके मकरंदरस को पीकर मधुमक्खियां उसका वमन करती हैं, उस वमन किये हुए उच्छिष्ट मधु (शहद) का सेवन धार्मिक पुरुष नहीं करते। लौकिक व्यवहार में भी पवित्र भोजन ही धार्मिक पुरुष के लिए सेवनीय बताया है ॥३८॥ यहां शंका प्रस्तुत की जाती है-मधु तो त्रिदोष शांत करता है। रोग-निवारण के लिए इससे बढ़कर और कोई औषधि नहीं है। तब फिर इसके सेवन में कौन-सा दोष है? इसके उत्तर में कहते हैं।२१०। अप्यौषधकृते जग्धं, मधु श्वभ्रनिबन्धनम् । भक्षितः प्राणनाशाय, कालकूटकणोऽपि हि ।।३९।। अर्थ :- रसलोलुपता की बात तो दूर रही, औषध के रूप में भी रोगनिवारणार्थ मधुभक्षण पतन के गर्त में डालने __का कारण है। क्योंकि प्रमादवश या जीने की इच्छा से कालकूटविष का जरा-सा कण भी खाने पर प्राणनाशक होता है ॥३९।। यहां पुनः एक प्रश्न उठाया जाता है कि-खजूर, किशमिश आदि के रस के समान मधु मधुर, स्वादिष्ट और समस्त | इंद्रियों को आनंददायी होने से उसका क्यों त्याग किया जाय? इसके उत्तर में कहते हैं ।२११। मधुनोऽपि हि माधुर्यमबोधैरहहोच्यते । आसाद्यन्ते यदास्वादाच्चिरं नरकवेदनाः ॥४०॥ अर्थ :- यह सच है मधु व्यवहार से प्रत्यक्ष में मधुर लगता है। परंतु पारमार्थिक दृष्टि से नरक-सी वेदना का कारण होने से अत्यंत कड़वा है। खेद है, परमार्थ से अनभिज्ञ अबोधजन ही परिणाम में कटु मधु को मधुर कहतें है। मधु का आस्वादन करने वाले को चिरकाल तक नरक सम वेदना भोगनी पड़ती है।।४०॥ मधु पवित्र होने से देवों के अभिषेक के लिए उपयोगी है, ऐसे मानने वाले की हंसी उड़ाई हैं।२१२। मक्षिकामुखनिष्ठ्यूतं, जन्तुघातोद्भवं मधु । अहो! पवित्रं मन्वाना, देवस्नाने प्रयुञ्जते ॥४१।। अर्थ :- अहो! आश्चर्य है कि मधुमक्खी के मुंह से वमन किये हुए और अनेक जंतुओं की हत्या से निष्पन्न मधु को पवित्र मानने वाले लोग शंकर आदि देवों के अभिषेक में इसका उपयोग करते हैं। भाई! यह तो ऐसा ही है, ऊंटों के विवाह में कोई गधा संगीतकार बनकर आया हो और वह ऊंट के रूप की प्रशंसा करता हो और ऊंट करता हो गधे के स्वर की प्रशंसा! इस प्रकार दोनों एक दूसरे की प्रशंसा करते हों, वैसा ही उक्त कथन है ॥४१।। अब क्रमानुसार पांच उदुंबर-सेवन के दोष बतलाते हैं।२१३। उदुम्बर-वट-प्लक्षकाकोदुम्बरशाखिनाम् । पिप्पलस्य च नाश्नीयात्, फलं कृमिकुलाकुलम्।।४२।। अर्थ :- उदुंबर (गुल्लर), बड़, अंजीर और काकोदुंबर (कठूमर) पीपल; इन पांचों वृक्षों के फल अगणित जीवों (के स्थान) से भरे हुए होते हैं। इसलिए ये पांचों ही उदूंबरफल त्याज्य हैं ।।४।। व्याख्या :- उदुंबर शब्द से पांचों ही प्रकार के वृक्ष समझ लेना चाहिए गुल्लर, बड़, पीपल (प्लक्ष), पारस पीपल, कठूमर, लक्षपीपल (लाख) इन पांचों प्रकार के वृक्षों के फल नहीं खाने चाहिए; क्योंकि एक फल में ही इतने कीट होते हैं, जिनकी गिनती नहीं की जा सकती। लौकिक शास्त्र में भी कहा है-'उदुंबर के फल में न जाने कितने जीव स्थित होते हैं और पता नहीं, वे कहां से कैसे प्रवेश कर जाते हैं? यह भी कहना कठिन है कि इस फल को काटने पर, टुकड़े-टुकड़े करने पर, चूर-चूर करने पर, या पीसने पर अथवा छन्ने से भली-भांति छान लेने पर या अलगअलग कर लेने पर भी उसमें रहे हुए जीव जाते (मर जाते) हैं या नहीं! अब पांचों उदुंबरफलों के त्याग रूप में नियम लेने वाले की प्रशंसा करते हैं ।।४२।। २१४) अप्राप्नुवन्नन्यभक्ष्यमपि क्षामो बुभुक्षया । न भक्षयति पुण्यात्मा पञ्चोदुम्बरजं फलम् ॥४३।। अर्थ :- जो पुण्यात्मा (पवित्र पुरुष) व्रतपालक सुलभ धान्य और फलों से समृद्ध देशकाल में पांच उदुंबरफल | 198
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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