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________________ मुनि के प्रति अश्रद्धा निवारण अभय की दीक्षा, संतोष की प्रशंसा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ११५ त्यागी साधु की व्यर्थ ही हांसी उड़ाते हैं। हमें क्या अधिकार है कि इस प्रकार का त्याग करने में अशक्त हम लोग ऐसे त्यागी का अपमान करे? हमें उनसे क्षमा मांगनी चाहिए। आयंदा, हमें कभी इनका या किसी भी साधु का तिरस्कार, अवगणना या उपहास नहीं करना चाहिए। इस प्रकार अभयकुमार के निवेदन पर लोगों ने उनका वचन शिरोधार्य किया और अपने-अपने स्थान पर चले गये। इस प्रकार बुद्धि का सागर, पितृभक्त में तत्पर, निःस्पृह, धर्मानुरागी अभयकुमार पिता के शासन को सुव्यवस्थित रूप से चलाता था। जो स्वयं धर्माचरण करता हो, वही जनता से धर्माचरण करा सकता है। जनता और पशु की वृत्ति, नेता और पशुपालक के अधीन होती है। एक ओर, जैसे अभयकुमार ने राज्यकार्यभार स्वयं उठाकर राजा को निश्चिंतकर दिया, वैसे ही दूसरी ओर वह बारह व्रतों वाला श्रावकधर्म स्वीकारकर अप्रमत्तचित्त भी बना। जिस तरह उसने बाहर के दुर्जय शत्रुओं को जीता, वैसे ही दोनों लोक में बाधक अंतरंग शत्रुओं को भी जीतता था। एक दिन राजा श्रेणिक ने उससे कहा-वत्स! अब इस राज्य को तुम संभालो, ताकि मैं निश्चिंत होकर श्रीवीर परमात्मा की सेवाभक्ति कर सकूँ। पिता की आज्ञा के भंग से और संसार परिभ्रमण से भीरु अभयकुमार ने कहापिताजी! आपकी आज्ञा सुंदर है, लेकिन कुछ समय प्रतीक्षा कीजिए। भगवान् महावीर भी उन दिनों उदायन राजा को दीक्षा देकर मरुभूमि से विहार करते हुए राजगृह पधार गये। अभयकुमार ने उनके चरणों में पहुंचकर नमस्कार किया और सर्वज्ञ तीर्थकर प्रभु से पूछा-प्रभो! आपकी विद्यमानता में अंतिम राजर्षि कौन होंगे? इसके उत्तर में भगवान् ने कहा-उदायन को ही अंतिम राजर्षि समझना। अभयकुमार ने उसी समय श्रेणिक राजा के पास आकर निवेदन कियापिताजी! यदि मैं राजा बन गया तो फिर ऋषि नहीं बन सकूँगा; क्योंकि वीरप्रभु ने अंतिम राजर्षि उदायन को बताया है। और वीरप्रभु जैसे स्वामी मिले हों और आप जैसे धर्मिष्ठ पिता मिले हों, फिर भी मैं संसार के दुःखों का छेदन न करूं तो मेरे सरीखा अधम और उन्मत्त और कौन होगा? इसलिए पिताजी अभी तो मैं नाम से अभय हं. मगर संसार से अत्यंत भयभीत हूं। इसलिए मुझे आज्ञा दीजिए, ताकि त्रिभुवन को अभयदान देने वाले श्रीवीरप्रभु का आश्रय लेकर पूर्ण अभय बन जाऊँ। अभिमान-वर्द्धक एवं वैषयिक सुखासक्ति कारक इस राज्य से मुझे क्या लाभ? क्योंकि महर्षि लोग तृष्णा में नहीं, अपितु संतोष में सुख मानते हैं। अभयकुमार से श्रेणिक राजा के बारबार अत्यंत आग्रह करने पर भी जब वह राज्य ग्रहण करने को तत्पर नहीं हुआ, तब विवश होकर श्रेणिकराजा ने उसी दीक्षा लेने की सहर्ष अनुमति दे दी। संतोषसुखाभिलाषी अभयकुमार ने राज्य को तिनके के समान त्यागकर वैराग्यभाव से चरम तीर्थंकर महावीर प्रभु के चरणकमलों में दीक्षा अंगीकार की। सुख प्रदायक, संतोष के धारक श्री अभयकुमारमुनि आयुष्य पूर्ण करके सर्वार्थसिद्ध नामक देवलोक में गये। इस प्रकार संतोष सुख का आलंबन लेने वाला अन्य व्यक्ति भी अभयकुमार के समान उत्तरोत्तर सुख प्राप्त करता है। यह है। संतोषव्रती अभयकुमार की जीवनगाथा ।।११४।। अब प्रचलित विषय-संतोष की ही प्रशंसा करते हैं।१७१। सन्निधौ निधयस्तस्य, कामगव्यनुगामिनी । अमराः किङ्करायन्ते, सन्तोषो यस्य भूषणम्।।११५।। अर्थ :- जिसके पास संतोष रूपी आभूषण हैं, समझ लो, पद्म आदि नौ निधियाँ उसके हाथ में हैं; कामधेनु गाय तो उसके पीछे-पीछे फिरती है और देवता भी दास बनकर उसकी सेवा करते हैं ।।११५।। व्याख्या :- संतोषव्रती मुनि शम के प्रभाव से तिनके की नोक से रत्नराशि को गिरा सकते हैं। वे इच्छानुसार फल देने वाले होते हैं, देवता भी प्रतिस्पर्धा पूर्वक उसकी सेवा के लिए उद्यत रहते हैं। इसमें कोई संशय नहीं है। संतोष के ही संबंध में कुछ श्लोकों का अर्थ यहां प्रस्तुत करते हैं-१. धन, २. धान्य, ३. सोना, ४. चांदी, ५ अन्य धातुएँ, ६. खेत, ७. मकान, ८. द्विपद, ९. चतुष्पद जीव; यह नौ प्रकार का बाह्य परिग्रह है। १. राग, २. द्वेष, 1. अन्य कथाओं में दीक्षा बिना पूछे लेने का कथन है। 186
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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