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________________ अभय को मायाविनी श्राविका ने चंडप्रद्योत को सौंपा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ११४ अभयकुमार भी चैत्यवंदन करने आया हुआ था। उसने इन तीनों को वहीं प्रतिमा के संमुख देववंदन करते हुए देखा। अभयकुमार यह सोचकर रंगमंडप में प्रवेश न करके द्वार पर ही खड़ा रहा कि 'अगर मैं अंदर प्रवेश करूंगा तो इन्हें | देववंदन करने में खलल पहुंचेगी। जब वे मुक्ताशुक्तिमुद्रा से प्रणिधान करके खड़ी हुई तो अभयकुमार भी उनके सम्मुख | आया। उनकी इस प्रकार की भावना और शांतवेश देखकर अभयकुमार उनकी प्रशंसा करता हुआ प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहने लगा-भद्रे ! अहोभाग्य से आज आप जैसी साधर्मी बहनों का समागम हुआ है। इस संसार में विवेकी आत्माओं के लिए साधर्मी से बढ़कर दूसरा कोई बंधु या भगिनी नहीं है। अगर आपको बताने में कोई आपत्ति न तो बताइए कि आप कौन है? कहां से आयी है? आपका निवास स्थान कहां पर है? स्वाति और विशाखा नक्षत्र से सुशोभित | चंद्रलेखा की भांति आपके साथ में ये दोनों महिलाएँ कौन है? उस बनावटी श्राविका ने कहा- मैं अवंतिवासी एक बड़े | सेठ की विधवा धर्मपत्नी हूँ। मेरे दो पुत्रों की मृत्यु हो जाने से वृक्ष की छाया के बिना लता की तरह से निराधार बनी | हुई ये दोनों मेरी विधवा पुत्रवधुएँ हैं। विधवा होने के बाद महाव्रत अंगीकार करने की इच्छा से इन्होंने मुझ से अनुमति मांगी। क्योंकि विधवा नारियों के लिए दीक्षा ही शरण्य है। मैं तो अब थक गयी हूं। फिर भी गृहस्थावस्था के अनुरूप व्रत धारण करूंगी। परंतु करूंगी तीर्थयात्राकर लेने के बाद ही । संयमग्रहण करने पर तो सिर्फ भावपूजा ही हो सकती है । द्रव्यपूजा गृहस्थ जीवन में ही हो सकती है; साध्वीजीवन में हो नहीं सकती। इस दृष्टि से इन दोनों के साथ मैं | तीर्थयात्रा करने को निकली हूं। यह सुनकर अभयकुमार ने कहा- आज आप मेरे यहां अतिथि बनें । तीर्थयात्रा करने वाले साधर्मिक का सत्कार तीर्थ से भी अधिक पवित्र करने वाला होता है। नकली श्राविका ने उत्तर दिया- आप ठीक | कह रहे हैं। परंतु तीर्थ के निमित्त से आज मेरा उपवास होने के कारण आज आपकी अतिथि कैसे बन सकती हूं? उसकी | धर्मभावना से प्रभावित होकर अभयकुमार ने फिर कहा- तो फिर कल प्रातः काल मेरे यहां जरूर पधारना । उसने प्रत्युत्तर | दिया - एक क्षणभर में जहां जीवन समाप्त हो जाता है, ऐसी स्थिति में कोई भी बुद्धिशाली यह कैसे कह सकता है कि मैं सुबह यह करूंगा? आपकी यह बात ठीक है, तो फिर कल के लिए निमंत्रण करता हूं। ऐसा कहकर उनसे विदा होकर स्वयं मंदिर में चैत्यवंदन करके अभयकुमार घर चला गया। दूसरे दिन सुबह उन्हें निमंत्रण देकर अभयकुमार ने गृहमंदिर में चैत्यवंदन किया और वस्त्र ग्रहण करने की भक्ति की। उन्होंने भी एक दिन अभयकुमार को निमंत्रण दिया । विश्वस्त होकर अभयकुमार अकेला ही उनके यहां गया। | साधर्मिक के आग्रह से साधर्मिक क्या नहीं करते? उन्होंने भी अभयकुमार को विविध प्रकार का स्वादिष्ट भोजन कराया। | और चंद्रहास मदिरामिश्रित जलपान कराया। भोजन से उठते ही अभयकुमार सो गया। क्योंकि मद्यपान की प्रथम सहचरी निद्रा होती है। पहले से सोची हुई व्यवस्था के अनुसार स्थान-स्थान पर रखे हुए रथों के कारण कोई इस षड्यंत्र को | जान नहीं सका और बेहोशी की हालत में ही कपटगृहसमा गणिका ने अभयकुमार को उज्जयिनी पहुंचा दिया। इधर अभयकुमार की तलाश करने के लिए श्रेणिक राजा ने चारों ओर सेवक दौड़ाए। स्थान-स्थान पर खोज करते हुए सेवक वहां भी पहुंचे, जहां गणिका ठहरी हुई थी। सेवकों ने उससे पूछा- क्या अभयकुमार यहां आया है? गणिका ने कहा- हां, आया जरूर था, मगर वह उसी समय चला गया। उनके उस वचन पर विश्वास रखकर ढूंढने वाले अन्यत्र | चले गये । वेश्या के लिए भी स्थान-स्थान पर घोड़े रखे गये थे। अतः वह घोड़े पर बैठकर उज्जयिनी पहुंच गयी। उसके | बाद प्रचंड कपट कला प्रवीण वेश्या ने अभयकुमार को चंडप्रद्योत राजा के सुपुर्द किया। चंडप्रद्योत राजा के द्वारा कैसे | और किस तरह लाई ? इत्यादि विवरण पूछने पर उसने अपने चातुर्य की सारी घटना आद्योपांत कही। इस पर चंडप्रद्योत | ने कहा - धर्मविश्वासी व्यक्ति को तूं धर्मछल करके लायी है, यह कार्य उचित नहीं किया। फिर चंडप्रद्योत ने अभयकुमार | से कहा- जैसे १७ बार बिल्ली से बचने का कहने वाला तोता स्वयं बिल्ली से पकड़ा जाता है, वैसे ही नीतिज्ञ होकर भी तुम कैसे पकड़े गये? अभयकुमार ने कहा- आप स्वयं बुद्धिशाली है, तभी तो इस प्रकार की बुद्धि से राजधर्म चलाते हैं। लज्जा और क्रोध से चंडप्रद्योत ने अभयकुमार को राजहंस के समान काष्ठ के पींजरे में बंद कर दिया । 1 चंडप्रद्योत के राज्य में अग्निभीरु रथ, शिवादेवी, नलगिरि हाथी, लोहजंघ लेखवाहक रत्न थे । लोहजंघ लेखवाहक को बार| बार भृगुकच्छ भेजा करता था । लेखवाहक के भी वहां बारबार आने जाने से लोग व्याकुल हो गये और उन्होंने परस्पर | मंत्रणा की कि 'यह लेखवाहक दिनभर में २५ योजन की यात्रा करता है, और बार बार हमें परेशान करता है, अतः 1. यह बात अन्य कथानक में नहीं आती। 183
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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