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________________ अभयकुमार के बुद्धिबल से चंडप्रद्योत की सेना में फूट योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ११४ एक बार उज्जयिनीनरेश चंडप्रद्योत सभी सामग्री एवं दलबल साथ में लेकर राजगृह को घेरकर चढ़ाई करने के लिए चला। उसके साथ परमाधार्मिक सरीखे १४ अन्य मुकुटबद्ध राजा थे। लोगों ने चंडप्रद्योत को आते हुए देखा। उसके तेजतर्रार घोड़े ऐसे दौड़ते हुए आ रहे थे, मानो पृथ्वी को चीर डालेंगे। गुप्तचरों ने आकर राजा श्रेणिक को तुरंत खबर दी। श्रेणिक सुनकर क्षण भर विचार में पड़ गया कि क्रूरग्रह के समान क्रुद्ध होकर संमुख आते हुए चंडप्रद्योत को कैसे कमजोर करें?' दूसरे ही क्षण राजा ने अमृत-समान मधुरदृष्टि से औत्पातिक बुद्धि के निधि अभयकुमार की ओर देखा। अतः यथानाम तथा गुण वाले अभयकुमार ने राजा से सविनय निवेदन किया-आज उज्जयिनीपति मेरे युद्ध का अतिथि बने। इसमें इतनी चिंता की क्या बात है? बुद्धिसाध्य कार्य में शस्त्रास्त्र की बात करना वृथा है। मैं तो बुद्धिबल का ही प्रयोग करूंगा। बुद्धि ही विजय दिलाने में कामधेनु सरीखी है। उसके बाद अभयकुमार ने नगर के बाहर जहां शत्रु की | सेना का पड़ाव था, वहीं लोहे के डिब्बों में सोने की दीनारें डालकर गड़वा दीं। समुद्र का जल जैसे गोलाकार भूमि को |घेर लेता है, वैसे ही चंडप्रद्योत की सेना ने राजगृह को चारों ओर से घेर लिया। अभयकुमार ने मिष्टभाषी गुसचरों के मारफत इस आशय का एक पत्र लिखकर भेजा अवंतिनरेश! शिवादेवी और चिल्लणादेवी में आप जरा भी अंतर मत समझना। इस कारण शिवादेवी के नाते आप मेरे लिये सदा माननीय है। मैं आपको एकांत हितबुद्धि से सलाह देता हूं कि मेरे पिता श्रेणिक राजा ने आपके समस्त राजाओं में फूट डाल दी है। उन्हें वश में करने के लिए राजा ने सोने की मुहरें भेजी है। उन्हें स्वयं स्वीकार करके वे आपको बांधकर मेरे पिताजी के सुपुर्द कर देंगे। मेरी बात पर आपको विश्वास न हो तो आप उनके निवासस्थान के नीचे खुदवाकर गड़ी हुई सोने की मुहरें निकलवाकर इतमीनान कर लें। जलता हुआ दीपक मौजुद हो तो आग कौन लेना चाहेगा? यह जानकर चंडप्रद्योत ने एक राजा के पड़ाव के नीचे की जमीन खुदवायी तो वहां पर अभयकुमार ने जैसा कहा था, उसी रूप में स्वर्णमद्राएँ मिल गयी। यह देखकर निराश चंडप्रद्योत वहां से चुपके से भाग गया। उसके भाग जाने से उसकी सारी सेना को समुद्र के समान मथकर श्रेणिक ने चारों ओर से घेर लिया। उस सेना के सारभूत हाथी, घोड़े आदि श्रेणिक ने अपने कब्जे में कर लिये। चंडप्रद्योत के नाक में दम आ गया। अतः किसी प्रकार अपनी जान बचाकर द्रुतगामी घोड़े से किसी भी तरह अपनी नगरी में पहुंचा। वे चौदह राजा एवं अन्य महारथी भी कौओं की तरह भाग गये। क्योंकि नायक के बिना सेना नष्ट हो जाती है। चंडप्रद्योत राजा के पीछे-पीछे जब वे राजा उज्जयिनी पहुंचे तो उनके बाल बिखरे हुए और फूर्-फूर् उड़ रहे थे, चेहरे उदास थे, मस्तक पर छत्र तो किसी के भी नहीं था। उन सभी राजाओं ने चंडप्रद्योत को शपथ पूर्वक विश्वास दिलाया कि 'महाराज! हम कभी ऐसा विश्वासघात करने वाले नहीं है। यह सारी चाल अभयकुमार की मालूम होती है। यह जानकर अवंतिनरेश को अभयकुमार पर बहुत रोष चढ़ा। एक बार अवंतिपति ने अपनी सभा में रोष पूर्वक कहा-'जो अभयकुमार को बांध करके यहां लाकर मुझे सोपेगा, उसे मैं मन चाहा धन इनाम में दूंगा।' एक वेश्या ने पताका के समान हाथ ऊँचे करके बीड़ा उठाया और चंडप्रद्योत से विनति की-राजन्! मैं इस काम को बखूबीकर सकती हूं। राजा ने उसे उस कार्य को करने की सहर्ष अनुमति दी। और कहा-इस कार्य में तुम्हें धन आदि किसी भी चीज की जरूरत हो तो बताओ। वेश्या ने सोचा-अभयकुमार और किसी उपाय से तो पकड़ में आना मुश्किल है, केवल धर्मप्रपंच से ही मैं अपना कार्य सिद्ध कर सकूँगी। अतः गणिका ने दो प्रौढ़ स्त्रियों की मांग की, अपने साथ ले जाने के लिए। राजा ने बहुत-सा धन देकर गणिका के साथ जाने के लिए दो स्त्रियाँ तैयार की। वे दोनों स्त्रियाँ गणिका के साथ छाया की तरह रहने लगी। अब ये तीनों स्त्रियाँ हमेशा साध्वियों की सेवाभक्ति करती थी, उनके प्रति आदर भाव रखती थी इस कारण साध्वियों से बौद्धिक उत्कृष्टता के कारण बहुतसा ज्ञान प्राप्त कर लिया। वे तीनों जगत् को ठगने के लिए मानो तीन माया मूर्तियां हों। वे तीनों एक गांव से दूसरे गांव घूमती हुई श्रेणिक नृप से अलंकृत राजगृह नगर में पहुंची। नगर के बाहर उद्यान में उन्होंने अपना पड़ाव डाला। गणिका उन दोनों साथिनों को लेकर चैत्य-परिपाटी करने की इच्छा से नगर में आयी। फिर राजा के द्वारा निर्मि अतिशय भक्तिभाव पर्वक तीन बार नैषिधिकी (निसीहि निसीहि करके उन तीनों ने प्रवेश किया। प्रतिमापूजन करके उसने मालवकौशिकी तर्ज में लय और तालसहित मधरभाषा में देववंदन करना प्रारंभ किया 182
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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