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________________ शील में दृढ़ सुदर्शन कपिला के कामजाल में नहीं फंसे योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक १०१ मैत्री हो गयी। जैसे बुध सूर्य का साथ नहीं छोड़ता, वैसे ही कपिल भी प्रायः महामना सुदर्शन का साथ नहीं छोड़ता था। एक दिन पुरोहितपत्नी कपिल ने अपने पति से पूछा - 'स्वामिन्! आप हमेशा अनेक करणीय कार्यों को नजर अंदाज | करके इतना समय कहां बिताते हो?" पुरोहित ने कहा- 'मैं अधिकतर सुदर्शन के पास रहता हूँ।' कपिला ने सुदर्शन का परिचय पूछा तो पुरोहित ने उत्तर दिया- 'प्रिये ! क्या तुम सज्जनपुरुषों में अग्रणी, जगत् में अद्वितीय रूपसंपन्न, | प्रियदर्शनीय मेरे मित्र सुदर्शन को नहीं जानती ?' लौ, मैं तुम्हें उसका परिचय कराता हूं। सुदर्शन ऋषभदास सेठ का बुद्धिशाली पुत्र है, वह रूप में कामदेव, कांति में चंद्रमा, तेज में सूर्य, गंभीरता में समुद्र, क्षमा में उत्तरमुनि, दान में | चिंतामणिरत्न के समान है; गुण रूपी माणिक्य का रोहणाचल पर्वत है, वह इतना मधुरभाषी है, मानो सुधा का कुंड हो, पृथ्वी के मुखाभरण के समान है। उसके समस्त गुणों का कथन करने में कौन समर्थ है? वह गुणचूड़ामणि शील | से कदापि स्खलित (विचलित) नहीं होता ।' पति के मुंह से सुदर्शन की रूप प्रशंसा सुनकर कपिला के हृदय में कामाग्नि धधक उठी; वह उसके रूप पर मन ही मन आसक्त हो गयी। प्रायः ब्राह्मणपत्नियाँ चंचल होती हैं। योगिनी जैसे परब्रह्म का समागम करने के लिए दिन-रात रटन करती है, वैसे ही कपिला सुदर्शन से समागम करने के लिए रातदिन रटन करती और उपाय सोचा करती थी । एक दिन राजा की आज्ञा से कपिल दूसरे गांव को गया हुआ था । कपिला यह अच्छा मौका देखकर सुदर्शन के |यहां पहुंची और उससे कहा - 'आज तुम्हारे मित्र का स्वास्थ्य अत्यंत खराब है, इसलिए वे तुमसे मिलने नहीं आये। | एक तो वे शरीर से भी स्वस्थ नहीं हैं, दूसरे वे तुम्हें न मिलने के कारण तुम्हारे विरह में बैचैन है । इसी कारण तुम्हें | बुलाने के लिए तुम्हारे मित्र ने मुझे भेजा है। 'मुझे तो अभी तक यह पता भी न था ।' यों कहकर सरल हृदय सुदर्शन तत्काल पुंरोहित के यहां पहुंचे। सज्जन स्वयं सरल होते हैं, इसलिए दूसरे के प्रति कपट की आशंका नहीं करते। | सुदर्शन ने घर में प्रवेश करते ही पूछा - 'कहाँ है, मेरा मित्र सुदर्शन ? कपिला ने कहा- 'आगे चलो, अंदर के कमरे में तुम्हारे मित्र सोये हुए हैं।' जरा आगे चलकर फिर सुदर्शन ने पूछा- कपिल यहां तो है नहीं, वह गया कहां?' उनका | स्वास्थ्य खराब होने से निर्वात स्थान में सोये हुए हैं। अतः भीतर शयनगृह में जाकर उनसे मिलो। शयनगृह में जब | कपिल नहीं मिला तो सरलाशय सुदर्शन ने कहा- 'भद्रे ! यह बताओ, मेरा मित्र कपिल कहां है?' कपिला ने तुरंत | शयनगृह का द्वार बंद करके सुदर्शन को पलंग पर बिठाया और उसके सामने अपने मनोहर अंगोपांग खोलकर बारीक | वस्त्र से ढकने का उपक्रम करने लगी। वह चंचलनयना कपिला रोमांचित होकर अपने अधोवस्त्र की गांठ खोलने लगी और हावभाव एवं कटाक्ष करती तथा ठहाका मारकर मुस्कराती हुई बोली- 'यहाँ कपिल नहीं है, इसलिए कपिला की | संभाल लो। कपिल और कपिला में तुम भेद क्यों करते हो?' सुदर्शन ने पूछा- 'कपिला की मुझे क्या संभाल करनी | चाहिए?' कपिला ने कहा- 'प्रिये ! जब से मैंने तुम्हारे अद्भुत रूप एवं गुणों की प्रशंसा सुनी है, तब से यह कामज्वर | मुझे पीड़ित कर रहा है। ग्रीष्म के ताप से तपी हुई पृथ्वी के लिए जैसे मेघ का समागम शीतलदायक होता है, वैसे ही विरहतापपीड़ित मुझे तुम्हारा समागम शीतलतादायक होगा। मेरे आज भाग्यकपाट खुले हैं कि छल द्वारा आपका आगमन हुआ है। अतः आप मुझे स्वीकारें। मैं आपके अधीन हूं, आपको अपना हृदय समर्पित कर रही हूं। चिरकाल से कामोन्माद से व्याकुल बनी हुई मुझ पीड़िता को अपनी आलिंगन रूपी अमृतवृष्टि से सांत्वना दे ।' सुदर्शन इस | अप्रत्याशित कामप्रार्थना को सुनकर हक्का-बक्का-सा हो गया। मन ही मन सोचा - 'धिक्कार है, इस निर्लज्ज नारी को ! | इसका यह विचित्र प्रपंच दैव के समान दुर्दमनीय है । ' प्रत्युत्पन्नमति सुदर्शन ने प्रकट में कहा- 'भद्रे ! युवापुरुष के लिए | तो तुम्हारी प्रार्थना उचित कही जा सकती है, लेकिन मैं तो नपुंसक हूं। तुम व्यर्थ ही मेरे पुरुषवेष को देखकर ठगी गयी हो ।' यह सुनते ही कपिला का काम का नशा उतर गया । मन ही मन पछताते हुए फौरन ही उसने द्वार खोलकर | कहा- 'अच्छा, अच्छा, तब तुम मेरे काम के नहीं हो, जाओ।' सुदर्शन भी यों सोचता हुआ झटपट बाहर निकल गया | कि अच्छा हुआ, झटपट इस नरक द्वार से छुटकारा मिला। अब वह सीधा अपने घर पहुंचा। सुदर्शन चिंतन की गहराई | में डूब गया - 'सचमुच ऐसी स्त्रियाँ कपट कला में राक्षसों से भी बढ़कर भयंकर, प्रपंच में शाकिनी सरीखी और चंचलता | में बिजली को भी मात करने वाली होती है। मुझे भय है, ऐसी कुटिल, कपटी, चपल, मिथ्यावादिनी नारी से कि कहीं 165
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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