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________________ अनुक्रम विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ ०३ चार अतिशयों से गर्भित महावीर-स्तुति इंद्र द्वारा शक्रस्तव से स्तुति इंद्र द्वारा देव सभा में प्रशंसा, एक देव का परीक्षा करने आना, दीक्षा ग्वाले का उपसर्ग चण्डकोशिक सर्प को प्रतिबोध एवं उसकी समता भगवान् महावीर की महाकरुणा, संगम देवकृतघोर उपसर्ग संगमदेव द्वारा भगवान् महावीर पर घोर उपसर्ग संगमदेव कृत घोर उपसर्ग संगमदेव द्वारा अंतिम उपसर्ग योगशास्त्र रचने का निर्णय योग महान्म्य, सनत्कुमार चक्रवर्ती को रूप पर गर्व और वैराग्य योग के प्रभाव से प्राप्त लब्धियाँ योग के प्रभाव से प्राप्त होने वाली विविध लब्धियाँ योग के प्रभाव से प्राप्त लब्धियाँ चारणलब्धि और उसके विविध प्रकार, ऋषभकुमार का जन्म एवं अंगोपांगों एवं विवाह का वर्णन ऋषभराजा का राज्याभिषेक राज्य व्यवस्था, देवों द्वारा विनंति ऋषभदेव दीक्षा, नमि - विनति धरणेन्द्र का विद्या देना, आहार ग्रहण प्रभु को केवलज्ञान, भरत का चिंतन ऋषभ प्रभु की देशना, मरुदेवा का मोक्ष संघ स्थापना भरत द्वारा षट्खण्डविजय, भरत द्वारा ९८ भाइयों को अधीन होने का संदेश ९८ भाइयों की दीक्षा बाहुबली के पास दूत भरत बाहुबली युद्ध बाहुबली की दीक्षा, भरत द्वारा स्तुति ऋषभ प्रभु का निर्वाण भरत को केवलज्ञान और मरुदेवा का वर्णन दृढ़प्रहारी का वर्णन दृढ़प्रहारीमुनि द्वारा समभाव से उपसर्ग-सहन चिलाती पुत्र चिलातीपुत्र के जीवन में योग का चमत्कार चिलातीपुत्र का दृष्टांत योग की प्रशंसा मोक्ष-पुरुषार्थ का मूल कारण - योग; ज्ञान-योग-जीव तत्त्व चौदह गुणस्थान अजीवतत्त्व आश्रव तत्त्व का वर्णन आश्रव से मोक्ष तत्त्व का वर्णन पांचज्ञान का स्वरूप दर्शन-चारित्र रत्न का स्वरूप चारित्र रत्न के महाव्रतों का स्वरूप . महाव्रतों का स्वरूप महाव्रतों की भावनाओं का स्वरूप अष्ट प्रवचन माता का स्वरूप भिक्षाचर्या स्वरुप-उद्गम दोष भिक्षाचर्या स्वरूप - उत्पादन दोष भिक्षाचरी के १० एषणादोष भिक्षाचर्या का स्वरूप-गोचरी समय के दोष अष्ट प्रवचन माता मातृत्व एवं धर्माधिकारी के ३५ गुणों पर विवेचन सम्यक्त्व के विपक्षी मिथ्यात्व का स्वरूप और . उसके प्रकार देवादि का स्वरूप चार अतिशयों से युक्त देवाधिदेव अर्हन् की विशेषता सामान्य देव द्वारा मुक्ति का अभाव सुगुरु और कुगुरु का अंतरधर्म स्वरूप, पौरुषेय अपौरुषेय वचन निर्णय कुदेवादि को मानने से हानि सम्यक्त्व के पांच लक्षण सम्यक्त्व के पांच भूषण हिंसक निंदनीय सम्यक्त्व के पांच दूषण अणुव्रत स्वरूप हिंसा के फल दुःखमोचकता और चार्वाकमत का खंडन हिंसक निंदनीय हिंसा के फलस्वरूप नरकगामी सुभूम चक्रवर्ती जमदग्नि का रेणुका के साथ पाणिग्रहण और परशुराम का जन्म, राज्य ग्रहण हिंसा के कारण सुभूमचक्रवर्ती को नरक की प्राप्ति ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती की कथा हिंसक की स्थिति १११ xii
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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