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________________ वैश्यागमन व परस्त्रीगमन के भयंकर दोष रावण की कथा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ९९ यह जानकर सुज्ञ पुरुष परदारागमन कैसे कर सकता है? परस्त्रीगमन की बात तो दूर रही, परस्त्रीचिंतन करना भी महाअनर्थकारी है।।९६।। इसे ही बताते हैं।१५५। विक्रमाक्रान्तविश्वोऽपि, परस्त्रीषु रिंसया । कृत्वा कुलक्षयं प्राप, नरकं दशकन्धरः ॥९९।। अर्थ :- अपने पराक्रम से सारे विश्व को कंपा देने वाला रावण अपनी स्त्री के होते हुए भी सीता सती को कामलोलुपतावश उड़ाकर ले गया और उसके प्रति सिर्फ कुदृष्टि की, जिसके कारण उसके कुल का नाश हो गया, लंकानगरी खत्म हो गयी। और वह मरकर नरक में गया। इतना बड़ा पराक्रमी भी जब अपने अनर्थ का फल पा चुका तो दूसरे की तो क्या बिसात है कि उसे परस्त्रीगमन का फल नहीं मिलेगा?।।९९।। अतः इससे सबक लेना चाहिएपरखीगमन की इच्छामात्र से रावण की नरकयात्रा : राक्षस नामक द्वीप में पृथ्वी के मुकुटमणिसमान त्रिकूट पर्वतशिखर पर स्वर्णमयी लंका नाम की विशाल नगरी थी। वहां पोलस्त्यकुलकौस्तुभ, महाप्रतापी, विश्व को अपने पराक्रम से हिला देने वाला, विद्याधरों का अधिपति राजा रावण राज्य करता था। उसके दो बाहुस्तंभों की तरह कुंभकर्ण और विभीषण नामक दो अतिबलशाली भाई थे। ___एक दिन उसने अपने पूर्वजों से उपार्जित नौ रत्न पिरोयी हुई एक माला देखी। मानो वह कुलदेवी हो, इस प्रकार आश्चर्यजनक दृष्टि से देखकर रावण ने वहां के बुजुर्गों से पूछा-यह माला कहां से आयी? इसमें क्या विशेषता है? उन्होंने कहा-'यह माला तुम्हारे पूर्वजों ने वरदान में प्राप्त की है। यह बहुत ही सारभूत और बहुमूल्य रत्नमाला है। इस माला की खूबी यह है कि जो इसे गले में पहनेगा, वह अर्द्धभरतेश्वर होगा। इस प्रकार कुल परंपरा से इस माला को राजा अपने गले में डालता चला आ रहा है। इस रिवाज के अनुसार तुम्हारे पूर्वज इसकी पूजा भी करते थे। माला की महत्ता सुनकर रावण ने वह माला अपने गले में डाल ली।' गले में डालते ही उसके नौ रत्नों में रावण के मुख का प्रतिबिंब पड़ने लगा। इसी कारण एक मुख के बजाय दस मुख दिखायी देने लगे। इसीसे रावण दशमुख नाम से प्रसिद्ध हुआ। तब से लोगों ने रावण का जयजय शब्दों से अभिनंदन किया। उस समय वह ऐसा प्रतीत होता था, मानो जगद्विजय के लिए उत्साहित हो। रावण के पास असाध्य साधना से सिद्ध की हुई प्रौढ़ सेना के समान, प्रज्ञप्ति आदि अनवद्य विद्याएँ थीं। इस कारण दुःसाध्य अर्धभरत क्षेत्र को उसने एक गांव को जीतने की तरह आसानी से जीत लिया; फिर भी खुजली की तरह बाहुबलि के समान उसकी राज्यलिप्सा मिटी नहीं। पूर्वजन्म में इंद्रत्व का अनुभव करने वाला अनेकविद्यासंपन्न इंद्र नाम का विद्याधरनृप वैताढ्यपर्वत पर राज्य करता था। विश्व में ऐश्वर्यबल के अतिरेक और पूर्वजन्म के इंद्रत्व के अभ्यास के कारण गर्वित होकर वह अपने को अहमिन्द्र समझता था। उसने अपनी पटरानी का नाम शची रखा, शस्त्र का नाम वज्र, पट्टहस्ती का नाम ऐरावण, घोड़े का नाम का नाम मातलि और चार महासभटों का नाम सोम, यम, वरुण और कुबेर रखा। वह स्वयं को इंद्र मानने के कारण दूसरों को तिनके के समान मानता था। भयंकर योद्धा होने से वह रावण को भी अपने सामने तुच्छ समझता था। यमराज के समान बलशाली रावण को जब यह पता चला तो वह उस पर क्रुद्ध होकर श्रावण के मेघों की-सी गर्जना करता हुआ उक्त इंद्र राजा से युद्ध करने चला। विद्या के प्रभाव से जल, स्थल और नभ तीनों प्रकार की सेना को लेकर समुद्र पार करके प्रलयकाल के तूफान की तरह उमड़ते हुए सैन्य रूपी अंधड़ से उड़ी हुई धूल से आकाश को आच्छादित करते हुए एकदम वैताढ्य पर पहुंचा। रावण को आते देखकर इंद्र भी सामने आया, क्योंकि मैत्री और वैर में पुरुषों का सम्मुख आना प्रथम कर्तव्य है। महापराक्रमी रावण ने इंद्र राजा के पास दूत भेजकर मधुर शब्दों में संदेश कहलवाया-'यहां कितने ही भुजबल के अभिमानी अथवा विद्याधर शासक हो गये हैं। उन सबने उपहार भेजकर दशकंधर राजा रावण की सेवाभक्ति की है। रावण द्वारा विस्मृत हो जाने और आपकी सरलता के कारण 1. अन्य ग्रंथों में जन्म समय में हार (माला) गले में पहनने की बात है। 153
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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