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________________ रोहिणेय की कथा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ७२ ऐसे उपाय किया करते हैं। मंडिक चोर कंकजाति की तीखी धार वाली तलवार लेकर वेताल के समान बाहर जीभ लटकाये हुए फुर्ती से राजा के पीछे दौड़ा। बृहस्पति के समान बुद्धिमान राजा उसे नजदीक आया जानकर चौक में खड़े किये हुए पत्थर के एक खंभे के पीछे छिप गया। क्रोध से लाल-लाल आँखें किये हुए मंडिक चोर ने आव देखा न ताव, खंभे को ही पुरुष समझकर कंकजातीय तलवार से छेदन करके अपने स्थान को लौट आया। चोर का पता लग जाने से राजा हर्षित होकर अपने महल में चला गया। दूसरों को परेशान करने वाला पकड़ा जाय तो किसे खुशी नहीं होती? ____ प्रातःकाल विश्वमानसहारी राजा उपवन में घूमने के बहाने चोर का पता लगाने के लिए निकला। एक कपड़े की दूकान पर सिलाई का काम करता हुआ, जांघों और पिंडलियों पर कपड़े के टुकड़े लपेटे हुए जरा-सा मुंह बाए मंडिकचोर बैठा था। वासलता से ढकी हुई टट्टी की तरह कपड़ों से कपटपूर्वक ढकी हुई आकृति बनाये हुए उस चोर को देखकर अनुमान से राजा रात को देखे हुए उस चोर को पहचान गया। राजा ने तुरंत राजमहल में आकर कुछ विश्वस्त सेवक बुलाये और हूलिया बताकर कहा कि-'अमुक-अमुक स्थान पर जिसके कपड़े की पट्टियाँ बंधी हुई है, उसे यहां बुला ले आओ। सेवक उस स्थान पर पहुंचा। और गौर से देखकर उसके पास, जाकर सेवक ने कहा-आपको राजाजी सम्मानपर्वक बला रहे हैं। चोर ने सनते ही मन में सोचा हो न हो. यह वही पुरुष है, जो उस समय मेरे यहां से भागने में सफल हो गया था. मारा नहीं गया है। उसी का ही यह परिणाम है कि अब राजा बुला रहा है। राजा-महाराजा अकसर चोर को पहचान जाते हैं। यह सोचकर वह चोर राजकुल में गया। राजा ने उसे अपने पास बड़े आसन पर बिठाया। क्योंकि मारना चाहने वाले नीतिज्ञ पुरुष पहले उस पर महाप्रसाद करते हैं। मंद-मंद मुस्कराते हुए राजा ने मधुर वचनों से उसे कहा-तुम अपनी बहन मुझे दे दो। कन्या तो दूसरों को देने योग्य ही होती है। अब तो मंडिक को निश्चय हो गया कि मेरी बहन को इसने पहले देखा है, इसलिए इसके सिवाय और कोई वहां नहीं गया, यह राजा ही गया है। उसने राजा से कहा-देव! आप मेरी बहन के साथ पाणिग्रहण करें। वह तो आपकी ही है; और मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब भी आपका ही है। जैसे कृष्ण ने अनुरक्ता रुक्मिणी के साथ विवाह किया था, वैसे ही राजा ने रूपवती मंडिक भगिनी के साथ विवाह किया। फिर राजा ने मंडिक को महाप्रधान पद दे दिया। समुद्र के अंतस्तल के समान राजाओं के अंतस्तल को कौन जान सकता है? अब राजा मंडिक चोर की बहन द्वारा रोजाना वस्त्र, आभूषण आदि उसके पास से मंगवाता था। 'धूर्त आदमी से ही धूर्त ठगा जाता है।' धीरे-धीरे राजा ने जब बहुत-सा धन मंगवा लिया तो एक दिन अपनी पत्नी से पूछा-प्रिये! अब तुम्हारे भाई के पास कितना धन और है? मंडिकभगिनी ने कहा-उसके पास इतना ही धन था। क्योंकि अपने प्रियतम से छिपाने जैसा कुछ भी नहीं होता। इसके पश्चात् कठोर आदेश वाले राजा ने अनेक प्रकार की यातनाएँ देकर उसे मरवा डाला। चोर संबंधी था तो भी उसे मरवा डाला। अतः चोरी का बुरा फल इस जन्म में भी किसी भी प्रकार से मिलता है; ऐसा समझकर समझदार व्यक्ति को चोरी से सदा बचना चाहिए। रोहिणेय चोर से संत बना :____ अमरावती की शोभा को मात करने वाले राजगृह नगर में अनेक राजाओं द्वारा सेवित श्रेणिक राजा राज्य करता था। कृष्ण के बुद्धिशाली पुत्र प्रद्युम्नकुमार की तरह उस राजा के नीति पराक्रमशाली एक पुत्र था। नाम था-अभयकुमार। उन दिनों वैभारगिरि की गुफा में साक्षात् रौद्ररस-सा मूर्तिमान लोहखुर नामक एक नामी चोर रहता था। राजगृह के निवासी नरनारी जब किसी उत्सव आदि में चले जाते, तब वह पीछे से चुपचाप पिशाच के समान जाकर उपद्रव मचाता और वहाँ से धन चुरा लाता; नगर को तो वह अपना भंडार या घर ही समझता था। किसी भी सुंदर स्त्री को देखते ही उससे बलात्कार करता था। उसे केवल चोरी के व्यवसाय की लगन थी और किसी भी आजीविका में उसका मन नहीं लगता था। सच है, मांसाहारी को मांस के सिवाय अन्य किसी भोजन से तृप्ति नहीं होती। उसकी पत्नी का नाम रोहिणि था। अपने ही रूप और व्यवहार के समान उसके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम रखा गया-रोहिणेय। मृत्यु के समय पिता ने उसे बुलाकर कहा-'बेटा! मैं जो कुछ कहूंगा, उसके अनुसार करने का वचन दो तो मैं तुम्हें एक बात कहूं।' उसने कहा-पिताजी! जैसा आप कहेंगे, तदनुसार में अवश्य करूंगा। इस संसार में पिता की आज्ञा का उल्लंघन 143
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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