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________________ मूलदेव की कथा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ७२ | उसकी जोड़ का कोई गायक नहीं है।' तब देवदत्ता ने उसे बुलाने के लिए माधवी नाम की कुबड़ी दासी भेजी । 'अधिकांश वेश्याएँ कलाप्रिय होती है।' कुब्जा ने उसके पास जाकर कहा - हे महाभाग ! कलाभंडार ! मेरी स्वामिनी | आपको आदर पूर्वक बुला रही है। इस पर मूलदेव ने कहा-कुब्जे ! मैं नहीं आ सकता । कुट्टिनी के अधीन रहने वाली | वेश्या के घर में कौन स्वतंत्र जीवी प्रवेश कर सकता है? इस पर प्रकार कहकर मूलदेव ने उस कुब्जा को निकट बुलाकर | विनोद की इच्छा से अपनी कलाकुशलता के बल पर धरती पर लिटाया और क्षणभर में उसका कुबड़ापन मिटाकर | कमल के नाल की तरह उसे सीधी और सुंदर बना दी। जब वह कुब्जा दासी बदली हुई आकृति में प्रसन्न होती हुई पहुंची तो देवदत्ता भी उसकी आकृति और चेष्टा देखकर ठगी - सी रह गयी। उसे आश्चर्य हुआ कि देवों के दिये हुए वरदान को पायी हुई-सी मेरी दासी भी इतनी सुंदर हो सकती है। अतः देवदत्ता ने उससे कहा- ऐसे चतुर कलाकार | एवं उपकारी को तो अपनी अंगुली काटकर अर्पण करके लाने में भी कोई हर्ज नहीं, तूं जा किसी भी मूल्य पर उसे यहां ले आ।' दासी मूलदेव के पास पहुंची और मधुर एवं चतुरोचित वचनों से उस धूर्तराजा को वेश्या के यहां निर्दिष्ट | मार्ग से प्रवेश कराकर ले आयी। राधा के यहां जैसे माधव सुशोभित होते थे, वैसे ही देवदत्ता के यहां मूलदेव शोभायमान | हो रहा था। कांति और लावण्य से सुशोभित उस वामन को देखकर गणिका ने उसे गुप्त देवता के समान मानकर आदर | पूर्वक आसन पर बिठाया । कुशलप्रश्न के पूछने के बाद स्वस्थ होने पर दोनों के हृदय की एकता स्वरूप चातुर्यपूर्ण | वार्तालाप के साथ मधुर गोष्ठी होने लगी । उसी समय वीणा बजाने में निपुण एक बुद्धिशाली वीणावादक आया । देवदत्ता ने उससे अतिकौतुक - युक्त वीणा | बजवायी । वीणावादक ने स्पष्ट ग्राम और श्रुतिस्वर से इतनी सुंदर ढंग से वीणा बजायी कि देवदत्ता भी झूमने और | उसकी प्रशंसा करने लगी। उस समय मूलदेव ने जरा-सा विनोद करते हुए कहा - 'उज्जयिनी के लोग सचमुच बड़े निपुण और गुण-अवगुण के पारखी है।' देवदत्ता ने शंकाभरी दृष्टि से कहा - इसमें क्या शक है? चतुरों की चातुर्ययुक्त | प्रशंसा में उपहास की शंका पैदा होती है। उसने कहा- आप सरीखे वीणावादक में क्या कमी है ?, यह कहना तो आश्चर्य की बात होगी। लेकिन इतना मैं कह सकता हूं कि यह वीणा गर्भ वाली है, इसमें बांस शल्ययुक्त है। आपने कैसे जाना ? | यह उपस्थित लोगों के पूछने पर मूलदेव ने उससे वीणा लेकर उसके बांस में से पत्थर का टुकड़ा खींचकर सबको | बताया। बाद में उस वीणा को दुरुस्त करके इस प्रकार मधुर और सुरीले स्वर में बजाने लगा, मानो श्रोताओं के कानों में अमृत घोल दिया हो। इस पर देवदत्ता ने कहा- 'कलानिधे! आप असाधारण पुरुष मालूम होते हैं, नर रूप में आप | साक्षात् सरस्वतीमय है । वह वीणावादक भी मूलदेव के चरणों में पड़कर कहने लगा- 'धन्य हो, स्वामिन्! मैं आपसे | वीणा बजाना सीखूंगा। आप मुझ पर कृपा करें ।' मूलदेव ने कहा- 'मैं यथार्थ रूप से तो वीणा बजाना नहीं जानता, परंतु जो अच्छे ढंग से वीणा बजाना जानते हैं, उन्हें मैं जानता हूं।' देवदत्ता ने पूछा- 'उनका नाम क्या है? वे कहाँ रहते हैं?' मूलदेव ने कहा - 'पूर्व दिशा में पाटलीपुत्र नामक नगर में महागुणी कलाचार्य विक्रमसेन रहते हैं, मैं उन्हीं का | सेवक मूलदेव हूं, उनकी सेवा में सदा रहता हूं। इसी बीच वहां विश्वभूति नाम का नाट्याचार्य भी आ गया । देवदत्ता | ने उसका परिचय देते हुए कहा - 'यह साक्षात् भरत ही है।' मूलदेव ने कहा- 'ऐसा ही होगा। तुम जैसी ने इसे कलाओं | का अध्ययन कराया होगा ।' उसके बाद विश्वभूति से भरत के नाटकों के विषय में बातें चलीं। बातचीत के सिलसिले | में मूलदेव को वह घमंडी मालूम पड़ा । केवल ऊपर ऊपर से जानने वाले ऐसे ही होते हैं।' मूलदेव ने मन ही मन सोचा - -'यह अपने आपको विद्वान समझता है। लेकिन तांबे पर सोने का मुलम्मा चढ़ाने की तरह, इसे जरा अंदर की झांकी | करा दूं।' अतः उसने सफाई से वाक्चातुरी करते हुए उसके भरत-संबंधी नाटक - व्याख्यान में पूर्वापर दोष बताये । इस पर विश्वभूति कुपित होकर अंटसंट बकने लगे। कहावत है कि चतुर या पंडित द्वारा पूछे गये प्रश्नों को सुनकर | अनभिज्ञ उपाध्याय क्रोध करके अपनी अज्ञानता छिपाते हैं। मूलदेव ने मुस्कराते हुए कहा - मित्र ! ऐसा प्रतीत होता है, कि नाटक के संबंध में तुम ललनाओं के नाट्याचार्य हो, औरों के नहीं। यह सुनकर वह निरुत्तर हो गया । देवदत्ता | आँखें तरेरती हुई मुस्कान भरी दृष्टि से उपाध्यायजी की झेंप मिटाने के लिए बोली- 'अभी तो आप जाने की जल्दी में होंगे, अतः बाद में शांतिपूर्वक विचारकर इस विषय में इस विशेषज्ञ को उत्तर देना । विश्वभूति बोला- 'देवदत्ता! अब 134
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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