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________________ अदत्तादान और उससे होने वाले दुष्परिणामों का वर्णन योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ६५ से ६९ जटाधारी, निर्वस्त्र या सवस्त्र तपस्वी भी यदि असत्य बोलता है, तो वह अत्यंत ही निंदनीय बन जाता है। तराजू के | एक पलड़े में असत्य कथन से उत्पन्न पाप को रखा जाय और दूसरे पलड़े में बाकी के सारे पाप रखे जाय और तोला जाय तो असत्य का पलड़ा ही भारी होगा। परदारागमन, चोरी आदि पापकर्म करने वालों को छुड़ाने के प्रत्युपाय तो मिल जायेंगे; लेकिन असत्यवादियों को छुड़ाने के लिए प्रतिकारक उपाय कोई नहीं है। यह सब सत्यवादी का ही फल है कि देव भी उसका पक्ष लेते हैं; राजा भी उसकी आज्ञा मानते हैं। अग्नि आदि उपद्रव भी शांत हो जाता है ।।६४।। इस तरह गृहस्थ श्रमणोपासक के दूसरे व्रत का वर्णन पूर्ण हुआ। अब तीसरा अस्तेयव्रत कहते हैं। अदत्तादान (चोरी) का दुष्फल बताये बिना मनुष्य चोरी से नहीं रुकता। इसलिए |सर्व प्रथम इसका दुष्परिणाम बताकर चोरी का निषेध करते हैं।१२१। दौर्भाग्यं प्रेष्यतां दास्यमङ्गच्छेदं दरिद्रताम् । अदत्तात्तफलं ज्ञात्वा, स्थूलस्तेयं विवर्जयेत् ॥६५।। अर्थ :- दुर्भाग्यता (भाग्य फूट जाना), किंकरता (दूसरे के घर में नौकर बनकर कार्य करना), दासता (गुलामी), शारीरिक पराधीनता. हाथ, पैर आदि अंगोपांगों का छेदन, निर्धनता आदि पूर्वजन्म में बिना दी हुई वस्तु को ग्रहण करने (अदत्तादानचोरी) का फल है ।।५।। इस प्रकार शास्त्र से अथवा गुरुमहाराज के श्री मुख से जानकर सुखार्थी श्रावक लोक व्यवहार में जिसे चोरी कहा जाता हो, उस स्थूल अदत्तादान का त्याग करे। आगे विस्तार से इनका स्वरूप बता रहे हैं।१२२। पतितं विस्मृतं नष्टं, स्थितं स्थापितमाहितम् । अदत्तं नाददीत स्वं, परकीयं क्वचित्सुधीः ॥६६।। अर्थ :- रास्ते चलते हुए या सवारी से जाते हुए गिरी हुई, उसके मालिक के भूल जाने से पड़ी हुई, खोयी हुई, मालिक को उसका पता भी न हो, इस प्रकार रखी हुई अथवा अमानत, धरोहर के सुरक्षित रखने के लिए रखी गयी, जमीन में गाड़ी हुई, दूसरे की वस्तु को उसके मालिक की इच्छा या अनुमति के बिना ग्रहण करना चोरी है। बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह किसी भी प्रकार के संकटापन्न द्रव्य. क्षेत्र. काल और भाव में हो, फिर भी चोरी न करे ।।६६।। चोरी का दूषण कितना निंदनीय है, यह बताते हैं।१२३। अयं लोकः परलोको, धर्मो धैर्यं धृतिर्मतिः । मुष्णता परकीयं स्वं, मुषितं सर्वमप्यदः ॥६७।। अर्थ :- दूसरे के धन की चोरी करने वाला उसके धन को ही हरण नहीं करता, अपितु इस लोक का जन्म, जन्मांतर, धर्महीनता, धृति, मति कार्याकार्य के विवेक रूप भावधन का भी हरण कर लेता है ।।६७।। हिंसा से चोरी में अधिक दोष है, इसे बताते हैं।१२४। एकस्यैकं क्षणं दुःखं, मार्यमाणस्य जायते । सपुत्रपौत्रस्य पुनर्यावज्जीवं हृते धने ॥६८।। अर्थ :- जिस जीव की हिंसा की जाती है उसे चिरकाल तक दुःख नहीं होता, अपितु क्षणभर के लिए होता है। मगर किसी का धन-हरण किया जाता है; तो उसके पुत्र, पौत्र और सारे परिवार का जिंदगी भर दुःख नहीं जाता। यानी पूरी जिंदगी उसके दुःख का घाव नहीं मिटता ॥६८।। अब चोरी के दुष्परिणाम विस्तार से बताते हैं।१२५। चौर्य-पापद्रुमस्येह, वधबन्धादिकं फलम् । जायते परलोके तु, फलं नरक-वेदना ॥६९।। अर्थ :- चोरी-रूप पाप-वृक्ष का फल इस जन्म में तो वध, बंधन आदि के रूप में मिलता ही है; किन्तु अगले जन्मों में नरक की वेदना के रूप में भयंकर फल मिलता है ।।६९।। व्याख्या :- कदाचित् तकदीर अच्छी (सद्भाग्य) हो, या राजा पुलिस आदि की असावधानी से नहीं पकड़ा जाय, | परंतु मन में हरदम पकड़े जाने का डर, उद्वेग, अस्वस्थता, अपकीर्ति (बदनामी) आदि इस जन्म के फल हैं।।६९।।। 10
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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