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________________ स्थूल असत्य के पांच प्रकार योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक ५४ हुए बोलना, गूंगा होना, मुंह में कोई रोग पैदा हो जाना; या दूसरी जीभ पैदा हो जाना, ये सब असत्य बोलने के फल है। यह देखकर शास्त्रबल से असत्य का स्वरूप जानकर श्रावक को चाहिए कि वह स्थल असत्य का त्याग करे। कहा भी है-असत्य वचन बोलने वाला गूंगा, जड़बुद्धि, अंगविकल (अपाहिज), तोतला अथवा जिसकी बोली किसी को अच्छी न लगे, इस प्रकार की अप्रिय बोली वाला होता है, उसके मुंह से बदबू निकलती रहती है ।।५३।। कन्या आदि के संबंध में जो स्थूल असत्य है, उसका स्वरूप बताते हैं।११०। कन्या-गो-भूम्यलीकानि, न्यासापहरणं तथा । कूटसाक्ष्यं च पञ्चेति, स्थूलासत्यान्यकीर्तयन् ॥५४॥ अर्थ :- कन्यासंबंधी, गोसंबंधी, भूमिसंबंधी, धरोहर या गिरवी (बंधक) रखी हुई वस्तु के अपलाप संबंधी और . कूटसाक्षी (झूठी गवाही) संबंधी; ये पांच स्थूल असत्य कहे हैं ।।५४।। व्याख्या :१. कन्याविषयक असत्य - कन्या के संबंध में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव से असत्य बोलना। जैसे-अच्छी कन्या को खराब और खराब कन्या को अच्छी कहना, या एक कन्या के बदले दूसरी कन्या बताना, एक देश या प्रांत की कन्या को दूसरे देश या प्रांत की बताना, छोटी उम्र की कन्या को बडी उम्र की या बड़ी उम्र की कन्या को छोटी उम्र की बताना। इसी तरह अमुक गुण व योग्यता वाली कन्या को दुर्गणी या अयोग्य बताना अथवा अमुक दुर्गुण या अयोग्यता वाली कन्या को गुणी व योग्य बताना। कन्या शब्द से उपलक्षण में कुमार, युवक, वृद्ध आदि सभी द्विपद मनुष्यों का ग्रहणकर लेना चाहिए। २. गो-विषयक असत्य - गाय के संबंध में भी द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव से असत्य बोलना। जैसे-दुबली, पतली, मरियल गाय को हृष्ट-पुष्ट, सबल और सुडौल बताना, मारवाड़ी गाय को गुजराती बताना या गुजराती आदि को मारवाड़ देश की बताना; अधिक उम्र की, बूढ़ी या अधिक बार व्याही हुई गाय को कम उम्र की, • जवान व एक-दो बार व्याही हुई बताना या इससे विपरीत बताना, कम दूध देने वाली को बहुत दूध देने वाली या इससे विपरीत बताना; गुणवान् या सीधी गाय को दुर्गणी या मरकनी बताना, या मरकनी एवं दुर्गुणी गाय को सीधी व गुणी बताना। गो शब्द से उपलक्षण से यहां समग्र चौपाये जानवरों स्कुटर, मोटर आदि के संबंधी असत्य समझ लेना चाहिए। ३. भूमि-विषयक असत्य - भूमि संबंधी झूठ भी द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव से चार प्रकार का समझ लेना चाहिए। जैसे-अपनी| जमीन को परायी कहना या परायी को अपनी कहना, उपजाऊ जमीन को बंजर और बंजर को उपजाऊ कहना, एक जगह की जमीन के बदले दूसरे जगह की जमीन बताना, अधिक काल की जोती हुई या अधिकृत जमीन को कम काल की जोती हुई या अनधिकृत बताना, बढ़िया जमीन को खराब और खराब को बढ़िया बताना। जमीन के विषय में लेने, न लेने की भावना को छिपाना। यहां उपलक्षण से भूमि शब्द से भूमि पर पैदा होने वाले पदार्थ, या रुपये, धन, जायदाद, मकान आदि सभी से संबंधित असत्य के विषय में समझ लेना चाहिए। कोई यहां शंकाकर सकता है कि यहां समस्त द्विपद या समस्त चतुष्पद अथवा समस्त निर्जीव पदार्थ से संबंधित असत्य को स्थूल असत्य न बताकर कन्या, गो या भूमि के संबंध में बोले जाने वाले असत्य का ही निर्देश क्यों किया? इसका समाधान यों करते हैं कि लोकव्यवहार में कन्या, गो या भूमि के संबंध में बहुत पवित्र कल्पनाएँ है, भारतीय संस्कृति में कन्या (कुंआरी) निर्विकारी होने के कारण पवित्र मानी जाती है, गाय और पृथ्वी को 'माता' माना गया है। इसलिए लोकादरप्राप्त इन तीनों के बारे में असत्य बोलना या असत्य बोलने वाला अत्यंत निन्द्य माना जाता है। इसलिए द्विपद; 123
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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