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________________ ब्रह्मदत्त चक्री की कथा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक २७ से अभिन्न थे। इसलिए तुम आश्रम को अपना घर समझकर जितने दिन इच्छा हो, उतने दिन खुशी से यहां रहो और | हमारे मनोरथों के साथ हमारे तप में भी वृद्धि करो।' जननयनों को आनंदित करता हुआ सर्ववल्लभ कुमार भी उस आश्रम में रहने लगा। इतने में वर्षाकाल आ पहुंचा। कुलपति ने अपने आश्रम में रहते हुए कुमार को भी शास्त्र एवं शस्त्रअस्त्र विद्याएँ उसी प्रकार पढ़ा दीं, जैसे बलदेव ने श्रीकृष्ण को पढ़ाई थी। सारसपक्षियों के कलरव से परिपूर्ण एवं बंधुसमान वर्षाकाल पूर्ण होने के बाद शरद्ऋतु के आते ही आश्रम के तापस फल तोड़कर लाने के लिए निकटवर्ती वन में चले। कुलपति के द्वारा आदर-पूर्वक रोके जाने पर भी ब्रह्मपुत्र तापसों के साथ वन में उसी प्रकार चला जिस प्रकार हाथी अपने बच्चों के साथ चलता है। वन में इधर-उधर घूमते हुए ब्रह्मपुत्र ने एक जगह किसी हाथी का ताजा मलमूत्र देखा। इस पर उसने सोचा-'यहां से कुछ ही दूर कोई हाथी होना चाहिए।' तापसों ने उसे आगे जाने से बहुत मना किया। फिर भी वह हाथी के पैरों के चिह्न देखता हुआ पांच योजन तक जा पहुंचा; जहां उसने पर्वत के समान एक ही लंगोट कसकर कमार ने गर्जना की। एक मल्ल जैसे दूसरे मल्ल को ललकारता है, वैसे ही मनुष्यों में हाथी के समान ब्रह्मदत्त ने हाथी को ललकारा। अतः लाल मुंह वाला हाथी कोपायमान होकर सभी अंगों को कंपाता हुआ सूंड लंबी करके कान को स्थिर करता हुआ कुमार की ओर झपटा। हाथी ज्यों ही कुमार के पास आया, त्यों ही बालक को फुसलाने की तरह हाथी को बहकाने के लिए उसने बीच में ही एक वस्त्र फेंका। मानो आकाश से आकाशखंड टूटकर पड़ा हो, इस दृष्टि से अतिरोषवश होकर हाथी ने उस वस्त्र को अपने दोनों दंतशूलों से क्षणभर में कसकर पकड़ लिया। जिस प्रकार मदारी सांप को नचाता है, उसी प्रकार कुमार ने विविध चेष्टाओं से हाथी को चारों ओर घुमाया। ठीक उसी समय ब्रह्मदत्त के दूसरे मित्र की तरह बादल गर्जने के साथ वर्षा अपनी जलधारा से हाथी पर आक्रमण करने लगी। अतः हाथी चिंघाड़ता हुआ मृगगति से भाग गया। कुमार भी पर्वत की ओर घूमता-घामता एक नदी के पास पहुंचा। उसने आपत्ति की तरह वह नदी पार की। नदी के किनारे उसने एक पुराना उजड़ा हुआ नगर देखा। उसमें प्रवेश करते ही उसने बांसों के ढेर में पड़ी हुई तलवार और ढाल को देखा; मानो उत्पातकारी केतु और सुरक्षाकारी चंद्रमा हो। उन दोनों को शस्त्रचालनकौतुकी कुमार ने कुतुहलवश उठाये और सर्वप्रथम तलवार से उस बांस के बड़े | ढेर को केले के पेड़ की तरह काट डाला। बांस के ढेर में उसे पृथ्वी में स्थलकमल के समान एक मानव-मस्तक दिखायी दिया, जिसके ओठ फड़फड़ा रहे थे। गौर से देखने पर उसे ज्ञात हुआ कि उलटा सिर किये किसी धूम्रपान करते हुए आदमी का ताजा कटा हुआ धड़ पड़ा है। यह बीभत्सदृश्य देखते ही वह पश्चात्तापयुक्त स्वर में | मैंने किसी निरपराध विद्यासाधक को मार डाला है, धिक्कार है मुझे!' यों आत्मनिंदा करते हुए कुमार ने ज्यों ही कदम आगे बढ़ाये, त्यों ही स्वर्ग से भूतल पर उतरे हुए नंदनवन के समान एक उद्यान देखा। उसमें प्रवेश करते ही सामने सातमंजला महल देखा, मानो वह सात लोक की शोभा से मूर्च्छित होकर यहां पड़ा हो। उस गगनचुंबी महल में चढ़ते हुए कुमार को खेचरी-सी एक नारी दिखायी दी; जो हथेली पर मुंह रखे चिंतित मुद्रा में बैठी थी। कुमार ने जरा आगे | बढ़कर उत्सुकता पूर्वक स्पष्ट आवाज में उससे पूछा-'भद्रे! तुम यहां अकेली कैसे बैठी हो? तुम्हारी मुख मुद्रा से ऐसा प्रतीत होता है कि तुम्हें कोई गहरी चिंता है। अगर मुझे बताने में कोई हर्ज न हो तो, बताओ-'तुम्हारी चिंता का क्या कारण है?' उस भयविह्वल नारी ने गद्गद्स्वर में उत्तर दिया-'भद्र! मेरी रामकहानी बहुत लंबी है। परंतु पहले यह | बताइये कि आप कौन है? जरा अपना परिचय दिजिए।' कुमार ने अपना परिचय देते हुए कहा-'मैं पांचालदेश के ब्रह्मराजा का पुत्र ब्रह्मदत्त कुमार हूँ।' इतना सुनते ही वह हर्ष से उछल पड़ी और उसके नेत्रों से हर्षाश्रु टपक पड़े। उसने कुमार के चरणों को पखारती हुई-सी उसके चरणों में गिर पड़ी और रोती-रोती कहने लगी-'कुमार! समुद्र में डूबते हुए को नौका की तरह मुझ अशरण अबला को आपकी शरण मिल गयी है।' कुमार के द्वारा आश्वासन देकर पूछे जाने पर उसने कहा-'भद्र! मैं आपकी माताजी के भाई पुष्पचूल की पुत्री पुष्पवती नाम की कन्या हूं। मेरे माता-पिता द्वारा मैं आपको दी हुई हूं। विवाह के दिन की प्रतीक्षा करती हुई मैं एक दिन बावड़ी के किनारे स्थित उद्यान में हंसनी के सदृश क्रीड़ा करने गयी थी। जिस प्रकार रावण सीता को बलात् अपहरण करके लंका ले आया था उसी भांति नाट्योन्मत्त नामक दुष्ट विद्याधर मुझे यहां अपहरण करके ले आया है। मेरी दृष्टि सहन न होने से शूपर्णखा सुत की तरह विद्यासाधन के लिए उसने इस वेणुवन में प्रवेश किया है। वहां वह धूम्रपान करते हुए पैर ऊपर को करके 101
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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