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________________ ब्रह्मदत्त चक्री की कथा योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक २७ | अरक्षित समझकर उसका बेखटके मनमाना उपभोग करने लगा । दुर्जन जैसे दीर्घकाल के सहवास से दूसरे के छिद्र को ढुंढ निकालता है, वैसे ही दुर्बुद्धि दीर्घ ने चिरकाल से गुप्त धनभंडार ढुंढ निकाला । पूर्वपरिचय के कारण वह ब्रह्मराजा के अंतःपुर में भी बेरोकटोक घूमने लगा । सचमुच, आधिपत्य मनुष्य से प्रायः अंधकार्य करा देता है। अतः दीर्घ अब चुलनी देवी के साथ एकांत में अकेला और प्रेमभरे वचनों से विनोद और हास्य करने लगा। यह गुप्तमंत्रणा कामबाणों से उसे बींधने वाली थी । इस प्रकार दीर्घराजा अपने कर्तृव्य, ब्रह्म राजा के उपकार और लोक मर्यादा की अवगणना करके चूलनीरानी में अत्यंत आसक्त हो गया। 'सचमुच, इंद्रियों को वश करना अतिकठिन है। चूलनी रानी ने भी ब्रह्मराजा | के प्रति पतिभक्ति का तथा पति के मित्र होने के नाते दीर्घ राजा के प्रति मित्रस्नेह का त्यागकर दिया। वास्तव में 'कामदेव सर्वविनाशक होता है।' इच्छानुसार सुख - विलास करते हुए लंबा अर्सा भी मुहूर्त के समान बीत गया। ब्रह्म राजा के अभिन्न हृदय मंत्री धनु को जब दीर्घराजा और चूलनी रानी के गुप्त दुराचार का पता लगा तो वह विचार में पड़ गया कि चुलनी देवी स्वभाव से ही पतिव्रत धर्म के विरुद्ध दुराचार का सेवनकर रही है। वास्तव में 'सती स्त्रियां विरली ही | होती है।' जिसे दीर्घराजा को राज्य, कोष और अंतःपुर की रक्षा करने और संभालने का काम विश्वास पूर्वक सौंपा था; वही दीर्घराजा आज विश्वास घात करके ब्रह्मराजा की रानी के साथ स्वच्छंद होकर रंगरेलियाँ कर रहा है। इसके लिए आज कुछ भी अकार्य नहीं रहा । संभव है, वह अब कुमार का भी कुछ अनिष्ट कर बैठे। दुर्जन मनुष्य बिलाव की तरह | पोषण करने वाले को भी अपना नहीं समझता। यों विचार करके उसने अपने पुत्र वरधनु को आदेश दिया - 'बेटा! तूं | ब्रह्मदत्तकुमार की सेवा में रहना और कोई गलत बात या नया समाचार हो तो मुझे सूचित करते रहना।' मंत्री पुत्र ने जब ब्रह्मदत्त कुमार को अंतःपुर में हो रही अघटित घटना की बात सुनायी तो उसे सुनकर ब्रह्मदत्त भी मतवाले हाथी की तरह धीरे-धीरे क्रोध से झल्लाने लगा। माता के दुश्चरित्र की बात जब असह्य हो उठी तो एक | दिन ब्रह्मदत्त एक कौएँ और कोयल को साथ लेकर अंतःपुर में पहुंचा। अपनी माता और दीर्घराज को उद्देश्य करके वह | इस प्रकार कहने लगा- 'वर्णसंकरता फैलाने वाले इन दोनों तथा और भी ऐसे कोई हों तो वे मार डालने के लायक है। मैं ऐसों को अवश्य ही दंड दूंगा। यह बात सुनकर दीर्घ राजा ने चूलनी से कहा- 'सुन ली न तुम्हारे बेटे की बात ? वह मुझे कौआ और तुम्हें कोयल बता रहा है और मौका मिलते ही वह हम दोनों को अवश्य ही कैदी बनायेगा। इस | पर रानी ने कहा- 'बालक के कथन पर तुम्हें जरा भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। एक बार भद्र हथिनी के साथ सूअर को अंतःपुर में ले जाकर दीर्घराजा और माता को प्रेरणा देने के बहाने उन दोनों पशुओं को पहले की | तरह उपालंभ देते हुए फटकारने लगा। यह सुनते ही दीर्घ राजा के कान खड़े हो गये। उसने फिर रानी से कहा देखो। न, फिर यह बालक हमें लक्ष्य करके कह रहा है, इस पर चूलनी रानी ने उससे कहा- अभी वह, नादान बच्चा है, चाहे जो कहे, हमें उसके कहने पर ध्यान नहीं देना चाहिए।' एक दिन हंसनी के साथ बगुले को बांधकर ब्रह्मदत्त अंतःपुर में ले गया और दोनों को लक्ष्य करके सुनाने लगा- 'खबरदार ! जैसे इस हंसनी के साथ बगुला क्रीड़ा करता है, वैसे किसी ने किया तो मैं जरा भी सहन नहीं करूंगा।' तब दीर्घ ने रानी से कहा- 'देवी! देख फिर यह तेरा पुत्र धुंआ उगलती हुई आग की तरह रोषाग्नि से भरी वाणी उगल रहा है। यह ज्यों-ज्यों उम्र में बड़ा होता जायगा, त्यों-त्यों | हम दोनों के लिए उसी तरह खतरनाक हो जायगा, जिस तरह केसरीसिंह हाथी - हथिनी के लिए होता है। इसलिए जवान एवं पराक्रमी होने से पहले ही इस जहरीले पेड़ को समूल उखाड़ फेंकना चाहिए। रानी यह बात सुनते ही सिहर | उठी। वह बोली- 'न, न प्रिय ! यह मुझसे कैसे 'सकेगा? तिर्यंच पशु-पक्षी भी अपने पुत्रों की भी प्राण रक्षा करते हैं, तब मुझे तो मानव जाति की और इसकी मां होने के नाते इसकी रक्षा करनी चाहिए । फिर यह तो राज्य लक्ष्मी का अधिकारी है। इसका विनाश करते हुए मेरा दिल कांप उठता है।' इस पर दीर्घराजा ने कहा- 'अब तेरा पुत्रोत्पत्ति का | समय तो आ ही रहा है। फिर व्यर्थ ही चिन्ता क्यों करती है? मैं हूं जब तक तेरे लिये पुत्र प्राप्ति दुर्लभ नहीं है।' यह | सुनकर शाकिनी के समान चूलनी भी रतिक्रीड़ा मूढ़ और स्नेह-परवश होकर पुत्र वात्सल्य को तिलांजली देकर दीर्घराजा की बात से सहमत हो गयी। परंतु साथ ही उसे बदनामी का भी भय था । इसलिए उसने दीर्घराजा से कहा'प्रिय ! कोई ऐसा षड्यंत्र रचो, जिससे हमारी बदनामी भी न हो और उसका विनाश भी हो जाय। मुझे तो यह काम 98
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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