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________________ अणुव्रत स्वरूप योगशास्त्र द्वितीय प्रकाश श्लोक १८ है। आदि शब्द से स्थूल झूठ, स्थूल चोरी, स्थूल अब्रह्मचर्य और स्थूल अपरिग्रह का भी समावेश हो जाता है। स्थूल | रूप से हिंसा आदि का त्याग करना या इनसे निवृत्त होना ही पंचाणुव्रत है; जिनके अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य | और अपरिग्रह नाम लोकप्रसिद्ध है। इन पांच अणुव्रतों का प्रतिपादन तीर्थंकर भगवंतों ने किया है। प्रश्न होता है कि तीर्थंकरों ने सर्व (सामान्यतः) विरति (त्याग) श्रमणोपासकों के लिए क्यों नहीं बतायी? द्विविध-त्रिविध रूप से ही क्यों बतायी ? इसके समाधान में कहते हैं - चूंकि गृहस्थ अपने परिवार के साथ रहता है, साथ ही इसके लिए धन-धान्य | आदि परिग्रह का भी उसे स्वीकार करना पड़ता है, ऐसी दशा में परिवार में से कोई व्यक्ति हिंसा, परिग्रह आदि करें तो | उसमें उक्त व्रती गृहस्थ की अनुमति - अनुमोदना आ ही जाती है; इस दृष्टि से उसे अनुमोदना का दोष लगता ही है। | अन्यथा परिग्रही और अपरिग्रही में कोई अंतर न रहने से दीक्षित ( श्रमण) और अदीक्षित ( श्रमणोपासक) का भेद ही समाप्त हो जायगा । इसलिए द्विविध-त्रिविध रूप से ही हिंसा आदि के त्याग का श्रावक के लिए आम विधान है। जिसका | अर्थ यों है - द्विविध यानी दो करण करना और कराना, त्रिविध यानी तीन योग-मन, वचन और काया । इसका अर्थ यों हुआ कि मैं मन, वचन और काया से स्थूल हिंसा नहीं करूंगा, न ही कराऊंगा। तीसरा करण अनुमोदना खुल्ला है। यहां शंका होती है कि भगवतीसूत्र आदि आगमों में श्रावक के लिए त्रिविध त्रिविध (तीन करण तीन योग से) | प्रत्याख्यान करना विहित है। शास्त्र में प्रतिपादित होने से वह अनवद्य (निर्दोष) ही है, तब उसका प्रतिपादन यहाँ क्यों | नहीं करते? इसके समाधान में कहते हैं - किसी विशेष परिस्थिति में ही श्रावक के लिए यह विहित है; जैसे कोई श्रावक | मुनिदीक्षा लेने का अभिलाषी हो, किन्तु पुत्रादि परिवार के पालन करने हेतु प्रतिमा धारण करके रहता है, वह अथवा | जो श्रावक स्वयंभूरमण आदि समुद्रों में रहे हुए मत्स्य आदि की स्थूल हिंसा आदि का विशेष परिस्थिति में प्रत्याख्यान करता है, वह पूर्वोक्त त्रिविध - त्रिविध रूप प्रत्याख्यान कर लेता है; उनकी अपेक्षा से भगवतीसूत्रादि में वैसा विधान | किया गया है। और उसका समावेश करने की दृष्टि से ही यहां द्विविध-त्रिविध शब्द के आगे 'आदि' शब्द का प्रयोग | किया है। मगर इस प्रकार के आराधक श्रावक बहुत ही विरले होते हैं। इसलिए हमने यहां नहीं बताया। आमतौर पर श्रावक के लिए द्विविध-त्रिविध रूप से प्रत्याख्यान विहित है। श्लोक के दूसरे चरण में द्विविध के आगे 'आदि' शब्द पड़ा है, अतः द्विविध त्रिविध के अलावा जो विकल्प (भंग) होते हैं, वे इस प्रकार है द्विविध-द्विविध - स्थूलहिंसा न करे, न कराये; मन और वचन से; अथवा मन और काया से या वचन और काया | | से। यह दूसरा प्रकार है । जब मन और वचन से करने-कराने का प्रत्याख्यान करता है, तब मन से अभिप्राय न देकर | वचन से भी हिंसा के लिए कथन नहीं करता; काया से भी असंज्ञी की तरह पापचेष्टा करता है । मन और काया से | हिंसा न करने न कराने का अर्थ यह है कि मन में हिंसा का अभिप्राय नहीं रखता, काया से भी हिंसा - प्रवृत्ति का त्याग करता है। परंतु अनुपयोग (अज्ञान) अवस्था में ही वाणी से कभी हिंसा-प्रवृत्ति कर बैठता है । वचन और काया से | करने-कराने के त्याग का अर्थ तो स्पष्ट है, लेकिन इस प्रकार के भंग से त्याग करने पर मन से अभिप्राय करके हिंसा करने-कराने का त्याग नहीं होता। अनुमोदन - त्याग तो उक्त तीनों में नहीं है। इस प्रकार अन्य विकल्पों का भी विचारकर लेना चाहिए। द्विविध- एकविध - करने और कराने का सिर्फ मन से या सिर्फ वचन से या सिर्फ काया से त्याग करना । यह तीसरा प्रकार है। एकविध - त्रिविध - हिंसादि करने या कराने का मन से वचन से और काया से त्याग करना । यह चौथा प्रकार है। एकविध-द्विविध - हिंसादि करने या कराने का मन और वचन से या मन और काया से अथवा वचन और काया से त्याग करना । यह पांचवां विकल्प है। एकविध - एकविध - हिंसादि करने या कराने का सिर्फ मन से या सिर्फ वचन से या सिर्फ काया से त्याग करना | यह छठा प्रकार है । [आ. नि. १५५८-५९] इसे एक श्लोक में यों संगृहीत किया गया है- प्रथम भेद - द्विविधत्रिविध, द्वितीय भेद - द्विविध-द्विविध, तृतीय भेद - द्विविध- एकविध, चतुर्थ भेद - एकविध - त्रिविध, पांचवां भेद- एकविध - द्विविध और छठा भेद-एकविध-एकविध है। 85
SR No.002418
Book TitleYogshastra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay
PublisherLehar Kundan Group
Publication Year
Total Pages494
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size24 MB
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