SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 383
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ कौन है आंख वाला विकर्षण है। आदर है और अनादर है। संबंध चाहते हैं स्थिर बना लें। वे नहीं बन पाते। हमने कितनी हमारी सारी तकलीफ यह होती है कि अगर किसी व्यक्ति के कोशिश की है कि पति-पत्नी का प्रेम स्थिर हो जाए, वह नहीं हो प्रति हमारा आदर है, तो हम कोशिश करते हैं, सतत बना रहे। वह पाता। बड़ा विषाद है, बड़ा दुख है, बड़ी पीड़ा है। कुछ स्थिर नहीं बना रह नहीं सकता। क्योंकि आदर के साथ वैसे ही रात भी जुड़ी हो पाता। मित्रता स्थिर हो जाए, शाश्वत हो जाए। कहानियों में है अनादर की। और प्रेम के साथ घणा की रात जड़ी है। | होती है। जिंदगी में नहीं हो पाती। और सभी चीजें बहती हुई हैं, प्रवाह है। यहां कोई चीज थिर नहीं | | कहानियां भी हमारी मनोवांछनाएं हैं। जैसा हम चाहते हैं जिंदगी है। इसलिए जब भी आप किसी चीज को थिर करने की कोशिश में हो, वैसा हम कहानियों में लिखते हैं। वैसा होता नहीं। इसलिए करते हैं, तभी आप मुसीबत में पड़ जाते हैं। लेकिन कोशिश आप हर कहानी, दो प्रेमियों का विवाह हो जाता है या कोई फिल्म या इसीलिए करते हैं कि आपको भरोसा है कि शायद चीजें थिर हो जाएं। कोई कथा-और खत्म होती है कि इसके बाद दोनों आनंद से रहने जवान आदमी जवान बने रहने की कोशिश करता है। सुंदर लगे। यहां खत्म होती है। यहां कोई जिंदगी खत्म नहीं होती। आदमी सुंदर बने रहने की कोशिश करता है। जो किसी पद पर है, कहानी चलती है, जब तक विवाह नहीं हो जाता और शहनाई वह पद पर बने रहने की कोशिश करता है। जिसके पास धन है, वह नहीं बजने लगती। और शहनाई बजते ही दोनों प्रेमी फिर सदा धनी बने रहने की कोशिश करता है। हम सब कोशिश में लगे हैं। | सुख-शांति से रहने लगे, यहां खत्म हो जाती है। और आदमी की हमारे अगर जीवन के प्रयास को एक शब्द में कहा जाए, तो वह | जिंदगी में जाकर देखें। यह है कि जीवन है परिवर्तनशील और हम कोशिश में लगे हैं कि शहनाई जब बजती है, उसके बाद ही असली उपद्रव शुरू होता यहां कुछ शाश्वत मिल जाए। कुछ शाश्वत। इस परिवर्तनशील | है। उसके पहले थोड़ी-बहुत सुख-शांति रही भी हो। उसके बाद प्रवाह में हम कहीं पैर रखने को कोई भूमि पा जाएं, जो बदलती | | बिलकुल नहीं रह जाती। लेकिन उसे हम ढांक देते हैं। वहां से परदा नहीं है। क्योंकि बदलाहट से बड़ा डर लगता है। कल का कोई | गिरा देते हैं। वहां कहानी खत्म हो जाती है। वह हमारी मनोवांछा भरोसा नहीं है। क्या होगा, क्या नहीं होगा, सब अनजान मालूम है, ऐसा होना चाहिए था। ऐसा होता नहीं है। होता है। और अंधेरे में बहे चले जाते हैं। इसलिए हम सब चाहते हम अपनी कहानियों में जो-जो लिखते हैं, वह अक्सर वही है, हैं कोई ठोस भूमि, कोई आधार, जिस पर हम खड़े हो जाएं, | जो जिंदगी में नहीं होता। हम अपनी कहानियों में उन चरित्रों को सुरक्षित। सिक्योरिटी मिल जाए, यह हमारी चेष्टा है। यह चेष्टा | बहुत ऊपर उठाते हैं आसमान पर, जो जिंदगी में हो नहीं सकते। बताती है कि हमें क्षणभंगुरता दिखाई नहीं पड़ती। जिंदगी तो बिलकुल क्षणभंगुर है। वहां कोई चीज थिर होती यहां सभी कुछ क्षणभर के लिए है। हमें यही दिखाई नहीं पड़ता। | नहीं; टिक नहीं सकती। टिकना वहां होता ही नहीं। . कृष्ण तो कहते हैं, और वही देखता है, जो क्षणभंगुर के भीतर | ___ इसे ठीक से समझ लें। क्षणभंगुर है जगत चारों तरफ। हम इस शाश्वत को देख लेता है। जगत से डरकर अपना एक शाश्वत मन का जगत बनाने की हमें तो क्षणभंगुर ही नहीं दिखाई पड़ता। पहली बात। क्षणभंगुर | | कोशिश करते हैं। वह नहीं टिक सकता। हमारा क्या टिकेगा; हम न दिखाई पड़ने से हम अपने ही मन के शाश्वत निर्मित करने की खद क्षणभंगर हैं। बनाने वाला यह मन क्षणभंगर है। इससे कछ कोशिश करते हैं। वे झूठे सिद्ध होते हैं। वे सब गिर जाते हैं। भी बन नहीं सकता। और जिस सामग्री से यह बनाता है, वह भी हमारा प्रेम, हमारी श्रद्धा, हमारा आदर, हमारे सब भाव मिट | क्षणभंगुर है। जाते हैं, धूल-धूसरित हो जाते हैं। हमारे सब भवन गिर जाते हैं। लेकिन अगर हम क्षणभंगुरता में गहरे देखने में सफल हो जाएं, हम कितने ही मजबूत पत्थर लगाएं, हमारे सब भवन खंडहर हो | हम क्षणभंगुरता के विपरीत कोई शाश्वत जगत बनाने की कोशिश जाते हैं। हम जो भी बनाते हैं इस जिंदगी में, वह सब जिंदगी मिटा न करें, बल्कि क्षणभंगुरता में ही आंखों को पैना गड़ा दें, तो देती है। कुछ बचता नहीं। सब राख हो जाता है। लेकिन फिर भी क्षणभंगुरता के पीछे ही, प्रवाह के पीछे ही, वह जो अविनश्वर है, हम स्थिर को बनाने की कोशिश करते रहते हैं, और असफल होते वह जो परमात्मा है शाश्वत, वह दिखाई पड़ जाएगा। रहते हैं। हमारे जीवन का विषाद यही है। । दो तरह के लोग हैं जगत में। एक वे, जो क्षणभंगुर को देखकर 357
SR No.002409
Book TitleGita Darshan Part 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1996
Total Pages432
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy