SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 322
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ॐ गीता दर्शन भाग-60 नाम की किताब पढ़नी है। मैंने पूछा कि तुझे अचानक क्या जरूरत | | बना रहता है। क्योंकि आपको डर तो रहता ही है कि पता नहीं, यह पड़ गई? उसने कहा कि नहीं, मुझे कई दिन से खयाल है पढ़ने का। | आदमी क्या करवाए। तो अगर वह कहे कि गाय का दूध लगाओ, अभी मेरे पास सुविधा है, तो मैं पढ़ना चाहता हूं। मैंने उसे चाबी दी | | तो आप लगा लेंगे। वह कहे कि आप स्त्री की तरह चलो, तो चल और उसने खोला; और जब मैं भीतर पहुंचा कमरे में, तो वह किताब | | लेंगे। लेकिन अगर वह कोई ऐसी बात कहे, जो आपके अंतःकरण पढ़ नहीं रहा था, वह पंद्रह नंबर के पृष्ठ कर दस्तखत कर रहा था। | के विपरीत पड़ती है, अनुकूल नहीं पड़ती है, या आपकी नैतिक जब वह पकड़ गया दस्तखत करते, तो बहुत घबड़ाया; और एकदम खिला है, तो आप तत्क्षण जाग जाएंगे और उसने कहा कि मेरी समझ के बाहर है, लेकिन मझे बड़ी बेचैनी हो। इनकार कर देंगे। रही थी कि कछ करना है। और कछ समझ में नहीं आ रहा था कि जैसे किसी जैन को जो बचपन से ही गैर-मांसाहारी रहा है, क्या करना है। और दस्तखत करते ही मेरा मन एकदम हलका हो सम्मोहित करके अगर कहा जाए कि मांस खा लो; वह फौरन जग गया, जैसे कोई बोझ मेरे ऊपर से उतर गया है। पर मैंने क्यों | जाएगा; वह सम्मोहन टूट जाएगा उसी वक्त। दस्तखत किए हैं, मुझे कुछ पता नहीं है। किसी सती स्त्री को, जिसका अपने पति के अलावा कभी तो ऐसी रिपोर्ट की गई हैं पुलिस में कि किसी सम्मोहक ने किसी | किसी के प्रति कोई भाव पैदा नहीं हुआ है, अगर उसे कहा जाए को सम्मोहित कर दिया और उससे कहा कि तू जाते वक्त अपने | सम्मोहन में कि इस व्यक्ति को चूम लो, उसकी फौरन नींद खुल पैसे की थैली यहीं छोड़ जाना; अपना मनीबैग यहीं छोड़ जाना; या| | जाएगी, सम्मोहन टूट जाएगा। लेकिन अगर स्त्री का मन दूसरे अपनी चेक बुक यहीं छोड़ जाना। वह आदमी चेक बुक वहीं छोड़ | पुरुषों के प्रति जाता रहा हो, तो सम्मोहन नहीं टूटेगा, क्योंकि गया जाते वक्त। तब तो खतरे हो सकते हैं। इसमें कुछ खास विरोध नहीं हो रहा है। शायद उसकी दबी हुई अचेतन मन बड़ा शक्तिशाली है। आपके चेतन मन की कोई भी | | इच्छा ही पूरी हो रही है। शक्ति नहीं है। आपका चेतन मन तो बहुत ही कमजोर है। इसीलिए __ तो जब कोई व्यावसायिक रूप से किसी को सम्मोहित करता है, तो आप संकल्प करते हैं कि सिगरेट नहीं पीऊंगा, छोड़ दूंगा; और | तो आपके भीतर एक हिस्सा तो सजग रहता ही है। बहुत गहरे घंटेभर भी संकल्प नहीं चलता है। क्योंकि जिस मन से आपने | | प्रवेश नहीं हो सकता। लेकिन जब कोई गरु और शिष्य के संबंध किया है, वह बहुत कमजोर मन है। उसकी ताकत ही नहीं है कुछ। में सम्मोहन घटित होता है, तो प्रवेश बहुत आंतरिक हो जाता है। अगर यही संकल्प भीतर के मन तक पहुंच जाए, तो यह | व्यक्ति अपने को पूरा छोड़ देता है। इसलिए समर्पण का इतना मूल्य महाशक्तिशाली हो जाता है। फिर उसे तोड़ना असंभव है। है, श्रद्धा का इतना मूल्य है। सम्मोहन के द्वारा व्यक्ति का ढांचा खोजा जा सकता है। लेकिन सम्मोहन के माध्यम से निश्चित ही व्यक्ति के टाइप का पता सम्मोहित ऐसे व्यक्ति से ही होना, जिस पर परम श्रद्धा हो। | लगाया जा सकता है। सम्मोहन के द्वारा व्यक्ति के पिछले जन्मों में व्यावसायिक सम्मोहन करने वाले व्यक्ति से सम्मोहित मत होना। प्रवेश किया जा सकता है। सम्मोहन के द्वारा व्यक्ति के भीतर क्योंकि उसकी आपमें उत्सुकता ही व्यावसायिक है। आपसे कोई कौन-से कारण हैं, जिनके कारण वह परेशान और उलझा हुआ है, आत्मिक और आंतरिक संबंध नहीं है। और जब तक आत्मिक और | वे खोजे जा सकते हैं। और सम्मोहन के माध्यम से बहुत-सी बातों आंतरिक संबंध न हो, तब तक किसी व्यक्ति को अपने इतने भीतर | का निरसन किया जा सकता है, रेचन किया जा सकता है; प्रवेश करने देना खतरनाक है। बहुत-सी बातें मन से उखाड़कर बाहर फेंकी जा सकती हैं। इसलिए गुरु तो प्रयोग करते रहे हैं। लेकिन इस प्रयोग को सदा हम जो भी करते हैं ऊपर-ऊपर से, वह ऐसा है, जैसे कोई किसी ही निजी समझा गया है। यह सार्वजनिक नहीं है। दो व्यक्तियों के | वृक्ष की शाखाओं को काट दे। शाखाएं कटने से वृक्ष नहीं कटता, बीच की निजी बात है। कभी-कभी तो...यह प्रयोग पूरा भी तभी नए पीके निकल आते हैं। वृक्ष समझता है कि आप कलम कर रहे हो सकता है, जब कि बहुत निकट और प्रगाढ़ संबंध हों। | हैं। जब तक जड़ें न उखाड़ फेंकी जाएं, तब तक कोई परिवर्तन नहीं जैसे कि स्टेज पर कोई सम्मोहित कर रहा है आपको, तो आप | होता। वृक्ष फिर से सजीव हो जाता है। कितने ही सम्मोहित हो जाएं, आपके भीतर एक हिस्सा असम्मोहित आप मन के ऊपर-ऊपर जो भी कलम करते हैं, वह खतरनाक 2961
SR No.002409
Book TitleGita Darshan Part 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1996
Total Pages432
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy