SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 205
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ • आधुनिक मनुष्य की साधना - इसलिए चोट लगती है। वे ईंटें खिसका रहे हैं। अगर हर कोई के हाथों से निर्मित हुआ है। अहंकार समाज का दान है। आत्मा कहने लगे कि तम करूप हो, तो फिर हमारी प्रतिमा डगमगाने परमात्मा की देन है। लगती है और आत्म-विश्वास हिलने लगता है। और फिर हम आत्मा को समाज नहीं छीन सकता। लेकिन अहंकार को समाज दर्पण के सामने भी खड़े होकर हिम्मत से नहीं कह सकते कि नहीं, छीन सकता है। जिसको आज कहता है, तुम महापुरुष हो; कल मैं सुंदर हूं। क्योंकि यह भी तो दूसरों के मंतव्य पर निर्भर है। तो पापी कह सकता है। और ऐसे महापुरुष हैं, जो कल पूजे जा रहे थे जब दूसरे कुछ कहने लगते हैं, जो विपरीत पड़ता है, तो आपको | और दूसरे दिन उन पर जूते फेंके जा रहे हैं। वही समाज, वही लोग! अपनी प्रतिमा डगमगाती मालूम पड़ती है। घबड़ाहट पैदा होती है, जरूरी नहीं है कि समाज पहले सही था, या अब सही है। बात इतनी बेचैनी पैदा होती है। | है केवल कि समाज दोनों काम कर सकता है। प्रशंसा में अच्छा लगता है, क्योंकि आपके अहंकार को इसलिए जो आदमी अहंकार के साथ जीता है, आत्मा के साथ फुसलाया जा रहा है। इसलिए प्रशंसा वही करता है, जो आपसे नहीं, वह हमेशा चिंतित रहेगा, कौन क्या कह रहा है! निंदा कौन कुछ पाना चाहता है। वह पाने का रूप कुछ भी हो। प्रशंसा वही कर रहा है? स्तुति कौन कर रहा है? क्योंकि उसका सारा व्यक्तित्व करता है, जो आपसे कुछ खींचना चाहता है। क्योंकि प्रशंसा | इसी पर निर्भर है, दूसरों पर। दूसरे क्या कह रहे हैं? पाकर आप बेहोश हो जाते हैं अहंकार में और आपसे कुछ __लेकिन जो व्यक्ति भक्त है, साधक है, प्रभु की खोज में लगा करवाया जा सकता है। है, आत्मा की तरफ चल रहा है, उसके तो पहले कदम पर ही वह मूढ़ से मूढ़ आदमी को बुद्धिमान कहो, तो वह भी राजी हो जाता | | इसकी फिक्र छोड़ देता है कि दूसरे क्या कह रहे हैं। वह इसकी फिक्र है! अपनी प्रशंसा को इनकार करना बड़ा मुश्किल है। और जब करता है कि मैं क्या हूं, वह इसकी फिक्र नहीं करता कि लोग क्या अपनी प्रशंसा को इनकार करना बड़ा मुश्किल है, तो अपनी निंदा | कह रहे हैं। को स्वीकार करना बड़ा मुश्किल है। लोग कुछ भी कह रहे हों, मैं क्या हूं, यह उसकी चिंता है। यह तो जरूरी नहीं है कि जो निंदक कह रहा हो, वह गलत ही हो; उसकी खोज है कि मैं खोज लूं, आविष्कृत कर लूं कि मैं कौन हूं। वह सही भी हो सकता है। और सच तो यह है कि जितना सही होता दूसरों के कहने से क्या होगा? क्या मूल्य है दूसरों के कहने का? है, उतना ज्यादा खलता है। अगर वह बिलकुल गलत हो, तो ज्यादा | कृष्ण कहते हैं, निंदा-स्तुति को समान जो समझता है...। परेशानी नहीं होती। अगर कोई आदमी, आपकी आंखें हैं और वह | | वही समान समझ सकता है, जो दूसरों के मंतव्य से अपने को कहता है अंधा है, तो आप ज्यादा परेशान नहीं होते। क्योंकि कौन दूर हटा रहा है। और जो इस बात की खोज में लगा है कि मैं कौन सुनेगा इसकी! आंखें आपके पास हैं। लेकिन आप अंधे हैं, और हूं। लोगों की धारणा नहीं, मेरा अस्तित्व क्या है। वह सम हो वह आदमी कहता है अंधा है, तो फिर ज्यादा चोट पड़ती है। क्योंकि | जाएगा। वह अपने आप सम हो जाएगा। उसके लिए लोगों की आपको भी लगता तो है कि वह ठीक ही कहता है। और मन भी | स्तुति भी व्यर्थ है; उसके लिए उनकी निंदा भी व्यर्थ है। वह तो नहीं होता मानने का कि यह बात ठीक है। . | बल्कि चकित होगा कि लोग मुझमें इतने क्यों उत्सुक हैं! इतनी तो जितने सच्चाई के करीब होती है निंदा, उतना दुख देती है। | उत्सुकता वे अपने में लें, तो उनके जीवन में कुछ घटित हो जाए, और स्तुति जितनी झूठ के करीब होती है, उतना सुख देती है। जितने | जितनी उत्सुकता वे मुझमें ले रहे हैं! असत्य के करीब होती है स्तुति, उतना सुख देती है। और निंदा ___ आपको खयाल है कि आप दूसरों में कितनी उत्सुकता लेते हैं! जितने सत्य के करीब होती है, उतना दुख देती है। पर इन सब दोनों इतनी उत्सुकता काश आपने अपने में ली होती, तो आज आप कहीं का केंद्र क्या है? होते। आप कुछ होते। आपके जीवन में कोई नया द्वार खल गया इन दोनों का केंद्र यह है कि दूसरे क्या कहते हैं, वह मूल्यवान | | होता। इतनी ही उत्सुकता से तो आप प्रभु को पा सकते थे। है। क्यों मूल्यवान है ? क्योंकि आपका जो अहंकार है, वह दूसरों लेकिन आपकी उत्सुकता दूसरों में लगी है! सुबह उठकर गीता के हाथ से निर्मित हुआ है, आपकी आत्मा नहीं। आपकी आत्मा तो | पर पहले ध्यान नहीं जाता; पहला ध्यान अखबार पर जाता है। परमात्मा के हाथ से निर्मित हुई है। लेकिन आपका अहंकार दूसरों दूसरों की फिक्र है। वे क्या कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं! पड़ोसी
SR No.002409
Book TitleGita Darshan Part 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1996
Total Pages432
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy