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________________ 0 गीता दर्शन भाग-60 इन दोनों के बीच में एक तीसरा त्रिशंकु है। वह न परमात्मा का क्योंकि जो साधु आनंदित नहीं है, समझना कि भूल में पड़ गया उसे कुछ पता है और पत्नी का भी पता खो गया है। वह बीच में | है। साधु के आनंद का तो कोई अंत नहीं होना चाहिए! हम क्षुद्र चीजों अटका है। वह कहता है, कर्तव्य पूरा कर रहे हैं। इसको वह में इतने आनंदित हैं और तुम परमात्मा के साथ भी इतने आनंदित नहीं कर्म-योग कहता है। यह कर्म-योग नहीं है। यह आदमी मुर्दा है। | हो! हम असार में इतने प्रसन्न हो रहे हैं, और तुम सार को पाकर भी इसमें हिम्मत ही नहीं है। इसको कुछ न कुछ तय करना चाहिए। | उदास बैठे हुए हो! हम कौड़ियों में नाच रहे हैं और तुम कहते हो, लेकिन एक बात हमेशा खयाल रखिए, जब भी आप सही दिशा | | हमने हीरे पा लिए हैं; और तुम्हारी शक्ल से पता लगता है कि तुमने में चलेंगे, तो आपके भीतर आनंद बढ़ेगा। और जब आप गलत | | कौड़ियां भी गंवा दी हैं। हीरे वगैरह तुम्हें मिले नहीं हैं। . दिशा में चलेंगे, तो उदासी बढ़ेगी। अगर आपका कर्तव्य आपको जिंदगी की सहज सम्यक धारा आनंद की तरफ है। आनंद को उदास कर रहा है, तो कहीं न कहीं भूल हो रही है। या तो परमात्मा | कसौटी समझ लें। वह निकष है। उस पर हमेशा कस लें। जो चीज की तरफ बढ़ें। या पत्नी की तरफ भी बढ़ें, तो भी हर्जा नहीं, लेकिन | | आनंद न दे, समझना कि कहीं न कहीं कोई भूल हो रही है। कम से कम खुश हों। क्योंकि पत्नी की तरफ खुश हुआ आदमी, और आनंद से भयभीत मत होना। और कोई कितना ही कहे कि कभी परमात्मा की तरफ भी खुश हो सकता है। क्योंकि खुशी तो | आनंद गलत है, भूलकर उसकी बात में मत पड़ना। क्योंकि अगर उसे आती है। आनंद तो उसे आता है। कम से कम एक बात तो | आनंद गलत है, तो फिर इस जगत में कुछ भी सही नहीं हो सकता। आती है कि वह आनंदित होना जानता है। कसना। और जो पत्नी तक की खुशी में इतना आनंदित हो जाता है, जिस ___ यह भी हो सकता है कि आनंद भूल भरा हो। जहां आप आनंद दिन उसे परमात्मा की तरफ यात्रा शुरू होगी, उसकी खुशी का कोई | | पा रहे हों, वहां आनंद पाने योग्य कुछ न हो। यह हो सकता है। अंत न होगा। जो अपने बच्चे की आंखों में खुशी देखकर इतना | | लेकिन आप आनंद पा रहे हैं, यह सही है, चाहे वह स्थिति सही न खुश हो रहा था, जिस दिन उसे इस सारे जगत में परमात्मा की रही हो। तो आनंद पाने को बढ़ाए जाना। जिस दिन आप पाएंगे कि प्रतीति होने लगेगी, उस दिन उसकी खुशी का कोई अंत होगा! कोई आपका आनंद ज्यादा हो गया और स्थिति छोटी पड़ने लगी, उस सीमा होगी! | दिन आप स्थिति के ऊपर उठने लगेंगे। लेकिन यह बीच वाला आदमी बहुत उपद्रव है। इस बीच वाले एक आदमी के हाथ में...एक छोटा बच्चा है। कंकड़-पत्थर आदमी से सावधान रहना। यह धोखे की बात है। इकट्ठे कर लेता है। और खुश होता है। रंगीन पत्थर बच्चे इकट्ठे कर जहां-जहां आनंद चकने लगे. सखने लगे धारा. समझना कि लेते हैं. बडे प्रसन्न होते हैं। खीसों में भर लेते हैं. बोझिल हो जाते हैं। आप गलत जा रहे हैं। क्योंकि जीवन का सम्यक विकास आनंद की | मां-बाप कहते हैं, फेंको! कहां कचरा ढो रहे हो? लेकिन वे नहीं तरफ है। अगर आप उदास होने लगें...। | फेंकना चाहते। रात अपने बिस्तर में लेकर सो जाते हैं। उनको आनंद इसलिए उदास साधु को मैं साधु नहीं मानता। वह बीमार है। आ रहा है। और अच्छा नहीं है वह बाप, जो कहता है, फेंको। उससे तो बेहतर वह गृहस्थ है, जो आनंदित है। कम से कम एक क्योंकि वह उनसे पत्थर ही नहीं छीन रहा है, उनका आनंद भी छीन बात तो ठीक है उसमें कि आनंदित है। लेकिन हम जिन साध-संतों रहा है। वह उसको पता नहीं है कि वह क्या गड़बड़ कर रहा है। को जानते हैं, आमतौर से सब लटके हुए चेहरे वाले लोग हैं। उनके | उसे तो ठीक है कि यह पत्थर है। उसकी समझ बढ़ गई है। पास जाओ, तो वे आपका भी चेहरा लटकाने की पूरी कोशिश | लेकिन बच्चे की समझ अभी उसकी समझ नहीं है। और जब वह करते हैं। अगर आप हंस रहे हो, प्रसन्न हो, तो जरूर पाप कर रहे बच्चे से पत्थर छीनकर फेंक देता है, तो उसे पता नहीं कि उसने एक हो। कहीं न कहीं कोई गड़बड़ है! | और अदृश्य चीज भी छीनकर फेंक दी, जो बहुत कीमती थी। पत्थर इन उदास लोगों से जरा बचना। ये बीमारियां हैं। और हमने और तो बेकार थे, लेकिन भीतर बच्चे का सुख भी उसने छीन लिया। तरह की बीमारियों से तो धीरे-धीरे छुटकारा पा लिया, और इस बच्चे को अभी समझ में आना मुश्किल है कि जो उससे एंटीबायोटिक्स खोज लिए। अभी इनसे छुटकारा नहीं हो सका। ये छीन लिया गया, वह व्यर्थ था। क्योंकि कैसे व्यर्थ था। बच्चा मन पर, छाती पर गहरी बीमारियां हैं, हैं। इनसे बचना। जानता है, उससे आनंद मिल रहा था। 9A
SR No.002409
Book TitleGita Darshan Part 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1996
Total Pages432
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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