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________________ Om दलीलों के पीछे छिपा ममत्व और हिंसा - परंपरा। और तब छठवां आदमी था बोधिधर्म, उसने पहली दफा | | का स्केल चौबीस घंटे एक-सा नहीं रहता। उसमें पूरे वक्त उस बात को कहा। इस बीच कोई नौ सौ वर्ष बीत गए। बोधिधर्म बदलाहट होती रहती है, वह फ्लिकर करता है। ने पहली दफे वह कहा, जो बुद्ध ने महाकाश्यप से कहा था। और जैसे जब आप दुख में होते हैं तो समय लंबा हो जाता है, और उसने क्यों कहा? क्योंकि जब बोधिधर्म ने चीन में पहली दफे | जब सुख में होते हैं तो छोटा हो जाता है। कोई प्रियजन पास आकर जाकर कहा कि अब मैं वह कहता हूं जो बुद्ध ने महाकाश्यप से | | बैठ जाता है, घंटा बीत जाता है, लगता है, अभी तो आए थे, क्षणभर कहा था, तो लोगों ने कहा, अब तक किसी ने नहीं कहा, तुम क्यों हुआ है। और कोई दुश्मन आकर बैठ जाता है, और क्षणभर भी नहीं कहते हो! तो उसने कहा कि अब चुपचाप सुनने वाला कोई भी बैठता है कि ऐसा लगता है, कब जाएगा! जिंदगी बीती जा रही है। उपलब्ध नहीं है। इसलिए मजबूरी है और मैं मरने के करीब हूं। वह घड़ी में तो उतना ही समय चलता है, लेकिन आपके मन के समय बात खो जाएगी जो बुद्ध ने महाकाश्यप से कही थी। अब जितनी की धारणा पूरे वक्त छोटी-बड़ी होती रहती भी गलत-सही मुझसे बन सकती है, मैं कहे देता हूं। __ घर में कोई मर रहा हो, रातभर उसकी खाट के पास बैठे तो ऐसा यह एक घटना है। इसलिए पहली बात आपसे कहूं, गीता कृष्ण | | लगेगा कि इटरनिटी हो गई, अनंत मालूम पड़ता है। अनंत मालूम और अर्जुन के बीच मौन-संवाद में घटी है। दूसरी बात आप से कहूं | पड़ता है। रात खतम होती नहीं मालूम पड़ती। कब होगी खतम! कि मौन-संवाद का टाइम-स्केल अलग है। इसे समझना भी जरूरी लेकिन वही कोई अपने प्रियजन के साथ नृत्य कर रहा है, और रात होगा। नहीं तो आप कहेंगे कि मौन-संवाद में भी तो कम से कम | | ऐसे भागने लगती है कि आज रात दुश्मन है और जल्दी कर रही घंटे, डेढ़ घंटे, दो घंटे तो लगते ही। क्योंकि इससे क्या फर्क पड़ता | | है। और रात जल्दी से भाग जाती है और सुबह आ जाती है। और है कि मैं आपसे ऊपर से कहूं कि भीतर से कहूं; समय तो लगेगा!| | ऐसा लगता है, सांझ और सुबह के बीच में कोई वक्त ही नहीं था। तब आपको थोड़ा समय के स्केल को, समय की सारणी को बस, सांझ आई और सुबह आ गई। बीच का वक्त गिर जाता है। समझना पड़ेगा। | सख में समय छोटा मालम होता है। छोटा हो जाता है: मालम आपको कभी एक दफा कुर्सी पर बैठे-बैठे झपकी लग जाती है | | होता नहीं, हो ही जाता है। दुख में बड़ा हो जाता है। दिन में भी, और आप एक सपना देखते हैं। और सपने में देखते हैं कि आपकी जागते में भी समय पूरे वक्त बदल रहा है। और अगर कभी आनंद शादी हो गई, घर बस गया, नौकरी लग गई, मकान खरीद लिया, का अनुभव किया हो, तो समय समाप्त हो जाता है। बच्चे हो गए, बच्चे बड़े हो गए, शहनाई बज रही है, लड़के की | जीसस से किसी ने पूछा कि तुम्हारे प्रभु के राज्य में खास बात शादी हो रही है। और तभी कोई आपको बगल से आपका आफिसर | क्या होगी? तो जीसस ने कहा, देयर शैल बी टाइम नो लांगरआकर उठाता है। और आप घड़ी में देखते हैं, और पाते हैं कि | | समय नहीं होगा। खास बात यह होगी। तो उन्होंने पूछा कि यह मुश्किल से एक मिनट बीता है झपकी लगे। तब बड़ी मुश्किल होती | | हमारी समझ में नहीं आता कि समय नहीं होगा, तो फिर सब काम है कि एक मिनट में इतना लंबा उपद्रव कैसे हुआ होगा! आधी | कैसे चलेगा! जिंदगी लग जाती है इतना उपद्रव करने में। तीस-चालीस साल लग | आनंद के क्षण में समय नहीं होता। अगर कभी ध्यान का एक जाते हैं, यह एक मिनट में कैसे हुआ? लेकिन बिलकुल हुआ। क्षण भी आपके भीतर उतरा है, कभी आनंद का एक क्षण भी आपको असल में ड्रीम-टाइम अलग है। उसका स्केल अलग है। स्वप्न नचा गया है, तो उस वक्त समय नहीं होता; समय समाप्त हो गया की जो समय की धारणा है, बिलकुल अलग है। इसलिए एक | होता है। इस संबंध में दुनिया के वे सारे लोग सहमत हैं-चाहे मिनट के सपने में जिंदगीभर के सपने देखे जा सकते हैं। एक मिनट महावीर, चाहे बुद्ध, चाहे लाओत्से, चाहे जीसस, चाहे मोहम्मद, में पूरी जिंदगी देखी जा सकती है। चाहे कोई और-वे सब राजी हैं कि वह जो क्षण है आत्म-अनुभव आमतौर से लोग कहते हैं कि जब कोई नदी में डूबकर मरता है, का, आनंद का, ब्रह्म का, वह टाइमलेस मोमेंट है; वह समयरहित तो आखिरी डुबकी में अपनी पूरी जिंदगी को फिर से देख लेता है। | क्षण है; वह कालातीत है। देख सकता है; इसमें कोई बहुत कठिनाई नहीं है। समय अलग है | - तो जो टेलीपैथी का समय है, उसके स्केल अलग हैं। क्षणभर स्वप्न का, जागने का समय अलग है। लेकिन जागने में भी समय | | में भी यह बात हो सकती है, जिसके लिए डेढ़ घंटा लिखने में लगे। 63
SR No.002404
Book TitleGita Darshan Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1996
Total Pages512
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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