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________________ एस धम्मो सनंतनो हो जाए। जैसे कोई मछली को पकड़ने के लिए कांटे में आटा लगाता है न, ऐसे बुद्ध ने थोड़ा सा आटा लगाया कांटे में। उग्गसेन फंस गया। बुद्ध जैसा व्यक्ति बंसी डाले, फंसो न तो क्या हो! इसीलिए तो बुद्धपुरुषों के संबंध में यह बात लोक प्रचलित हो गयी कि उनसे लोग सम्मोहित हो जाते हैं; कि लोग उनके मेस्मेरिज्म में आ जाते हैं; कि लोग उनके हाथ में बंध जाते हैं। उनसे सावधान रहना, जरा दूर-दूर रहना। उनसे जरा बचकर रहना! बुद्ध ने कहाः मैं भी तेरा खेल देखने आया उग्गसेन। अब बुद्ध को क्या इस खेल में हो सकता है ? सारे संसार का खेल जिसके लिए व्यर्थ हो गया, उसको किसी के रस्सी पर चलने में क्या सार हो सकता है? लेकिन अगर उग्गसेन को अपनी तरफ लाना है, तो उग्गसेन की तरफ जाना होगा। तो गुरु कई बार शिष्य की भूमिका में उतरता है। कई बार उसका हाथ पकड़ने वहां आता है, जहां शिष्य है। अगर शिष्य वेश्यागृह में है, तो गुरु वहां आता है। और अगर शिष्य कारागृह में है, तो गुरु वहां आता है। इसके सिवाय कोई उपाय भी नहीं। उग्गसेन अति आनंदित हो उठा। उसने तो यह सोचा भी नहीं था। ऐसा धन्यभाग कि बुद्ध और उसका तमाशा देखने आएंगे! इसका तो सपना भी नहीं देखा था। यह तो सोच भी नहीं सकता था। बुद्ध ने तो किसी का खेल कभी नहीं देखा। किसी का तमाशा कभी नहीं देखा। __ उसने बहुत तरह के खेल दिखाए; बड़ी उमंग, बड़े उत्साह से। _तब शास्ता ने उससे कहा : उग्गसेन, ये खेल बड़े अच्छे हैं। लोगों का मनोरंजन भी करेंगे। लेकिन तमाशा आखिर तमाशा है। तमाशे में ही जिंदगी गंवा देगा? मनोरंजन तो ठीक है। असली बात तो तब घटती है, जब मनोभंजन होता है। मनोरंजन तो मन की खुशामद है। वही तो अर्थ है मनोरंजन शब्द का-मन की खुशामद। मन पर मक्खन लगाना। वही मनोरंजन है—मन जो कहे, वैसा ही करते रहना। मन जहां ले जाए, उसके साथ चले जाना। मन कहे शराबघर; मन कहे वेश्याघर; मन कहे सिनेमा; मन कहे यह, मन कहे वह; उसी के पीछे चलते रहना। इसी तरह तो संसार है। संसार का अर्थ होता है : मन के पीछे चलना। चैतन्य को मन के पीछे चलाना अर्थात संसार। ___मनोभंजन चाहिए, बुद्ध ने कहा। और यह भी कोई कला है! अगर कला ही दिखानी है, तो आ मैं तुझे सिखाऊं। रस्सी पर चलने में क्या रखा है? यह तो साठ हाथ ऊंची बंधी है न, मैं तुझे शिखरों पर चलना सिखाऊं, बादलों पर चलना सिखाऊं। मैं तुझे ध्यान में सधना सिखाऊं। उससे ऊपर और कुछ भी नहीं है। कोई रस्सी उतने ऊपर नहीं बांधी जा सकती।
SR No.002388
Book TitleDhammapada 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1991
Total Pages366
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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