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________________ एस धम्मो सनंतनो उठ गया। अब तुम चिंता न करो, जो समझ में नहीं आता उसकी; वह भी धीरे-धीरे आ जाएगा। अब तुम अपनी समझ को फैलाओ। अब तुम अपनी समझ को बड़ा करो। तुम्हारे आंगन में भी आकाश उतरा है, अब तुम आंगन के चारों तरफ की दीवाल को गिराओ। थोड़ा सा उतरा है आकाश; आंगन छोटा है, आकाश का कसूर क्या ? आंगन का भी क्या कसूर? इतना उतर आया, यह भी कुछ कम चमत्कार है ? आकाश जैसी विराट घटना तुम्हारे छोटे से आंगन को भी छूती है । अब तुम अपने आंगन की दीवालों को गिराने में लग जाओ । समझदार इतना समझते ही कि थोड़ी सी बात मेरी समझ में आ गई, उसको पकड़ लेता है, उसी के सहारे लंबी यात्रा हो जाती है। लाओत्सु ने कहा है : एक-एक कदम से दस हजार मील की यात्रा पूरी हो जाती है। ज्यादा जरूरत भी क्या है ? आदमी एक बार में एक ही कदम चलता है। छोटा सा दीया चार कदम रोशनी फैलाता है, उतने से आदमी सारे संसार के अंधेरे को पार कर जाता है; आगे बढ़े, चार कदम आगे रोशनी पड़ने लगती है। चार कदम दिखने लगें, बहुत है । 'यह मेरी समझ में भी आता है, फिर भी समझ के बाहर रह जाता है ।' जब भी समझ में आता है तो ऐसा भी समझ में आएगा। यह समझ का ही अनिवार्य अंग है कि समझ में आता भी है – कुछ एक पहलू, एक झलक — और समझ के पार भी रह जाता है। छोटा बच्चा जैसे अपने बाप का हाथ पकड़े हो, अब हाथ जरा सा हाथ में है, पूरा पिता तो हाथ में नहीं है, उतना काफी है। मेरा थोड़ा सा हाथ भी तुम्हारे हाथ में आ जाए, उतना काफी है। जो मैं तुमसे कह रहा हूं, उसमें से थोड़ी सी बात भी तुम्हारे हाथ में आ जाए तो बस काफी है। उसी के सहारे तुम धीरे-धीरे अपनी समझ को बड़ा करते जाओगे । यहीं यात्रियों में फर्क पड़ जाते हैं। कुछ हैं, जो कहते हैं कि हम पूरा न समझ लेंगे, तब तक हम कदम न उठाएंगे। धीरे-धीरे वे पाएंगे : जो समझ में आया था वह भी खो गया, अब वह भी समझ में नहीं आता । दूसरे वे हैं, जो कहते हैं कि इतना समझ में आ गया, इसका उपयोग करेंगे, इसको सीढ़ी बनाएंगे, इसकी नाव ढालेंगे, इसमें यात्रा करेंगे। जब इतना समझ में आ गया तो शेष भी आ ही जाएगा। ऐसे यात्री यात्रा पर निकल जाते हैं। तो जो कल तक समझ में नहीं आता था, धीरे-धीरे वह भी समझ में आने लगता है । जैसे-जैसे तुम्हारी समझ बड़ी होती है, वैसे-वैसे समझ में आने लगता है। और अंततः जिस दिन तुम्हारी समझ की कोई सीमा नहीं रह जाती, उसी दिन असीम समझ में आएगा। जिस दिन तुम आंगन की सब दीवालें तोड़ दोगे, गिरा दोगे । ध्यान रखना, गलत पर ध्यान मत देना । ध्यान रखना, अभाव पर ध्यान मत देना । ध्यान रखना, निषेध पर ध्यान मत देना । जो समझ में आ जाए उसके लिए 42
SR No.002381
Book TitleDhammapada 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1991
Total Pages314
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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