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________________ सांसारिक मोह में फंसे हुए संसारी जीवों-प्राणियों को प्रभु को मूर्ति-प्रभु को प्रतिमा एक सर्वोत्तम मार्गदर्शक है । उपकारी के उपकार को मानना यह भी उद्देश्य है। वीतराग विभु श्री जिनेश्वर तीर्थंकर परमात्मा ने धर्मतीर्थ प्रवाया और आत्मोन्नति के लिये धर्ममार्ग का निःस्वार्थ सद्धर्म-देशना-सदुपदेश देकर अपने पर महान् उपकार किया है। इसलिये उनके उपकार को स्मरण कर हरदम उनकी उपासना, अर्चना एवं सेवा-भक्ति करना अति आवश्यक उचित-योग्य है। (१४) मूत्तिपूजा के विरोधी भी मूत्तिपूजा को मानते हैं अनादिकाल से विश्व में दो पदार्थ विशेष प्रसिद्ध हैं । चेतन और जड़ । संसार की समस्त अवस्थानों में जीवआत्मा का कार्य रूपी मूर्तिक पदार्थ को स्वीकार किये बिना नहीं चल सकता । प्रत्येक चेतनावन्त व्यक्ति को जड़ वस्तुपदार्थ का आलम्बन लेना ही पड़ता है। जैसे-(१) कालसमय अरूपी है, तो भी उसको पहचानने के लिए घटिकायन्त्र [घड़ियाल] रूपी प्राकृति-प्राकार मानना ही पड़ता है। (२) अपने खाद्य और पेय पदार्थ, वस्त्र एवं अलंकार मूत्ति की सिद्धि एवं मूर्तिपूजा की प्राचीनता-३४
SR No.002340
Book TitleMurti Ki Siddhi Evam Murti Pooja ki Prachinta
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSushilsuri
PublisherSushilsuri Jain Gyanmandir
Publication Year1990
Total Pages348
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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