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________________ खंड-3 जैन नीति और विभिन्न वादों का तुलनात्मक मूल्यांकन (Part-III) (Comparative Evaluation of Jaina Ethics with other Ethical Thoughts) 357-378 1. जैन नीति और नैतिक वाद संदेहवाद; सुखवाद; नैतिक सुखवाद अथवा उपयोगितावाद ; विकासवादी सुखवाद ; बुद्धिपरकतावाद ; आत्मपर्णतावाद; विधानवाद; अन्तरात्मवाद ; सहानुभूतिवाद ; नैतिक अन्तरात्मवाद ; सहजज्ञानवाद; मानवतावाद; साम्यवाद ; गाँधीवादी नीति दर्शन ; उपसंहार। 379-400 2. अधिकार-कर्तव्य और अपराध एवं दण्ड अधिकारं और कर्तव्य ; व्यक्ति के नैतिक अधिकार ; नैतिक कर्तव्य ; कर्तव्यों और अधिकारों में पारस्परिक संबंध ; कर्तव्याकर्तव्य विचार ; कर्तव्यों का वर्गीकरण; मेरा स्थान और मेरे कर्तव्य ; दण्ड ; दण्ड क्या है? ; दण्ड के सिद्धान्त ; बदला लेने का सिद्धान्त ; निवर्तनवादी सिद्धान्त ; सुधारात्मक सिद्धान्त ; अपराध के सिद्धान्त। 3. नीति की सापेक्षता और निरपेक्षता 401-408 सापेक्षता और निरपेक्षता का विवेचन ; सापेक्षता का विवेचन और स्वरूप ; एकांगी दृष्टि की अपूर्णता ; सापेक्षता की कोटियाँ ; नीति का मानक और आध यात्मिक स्वतंत्रता ; निरपेक्ष आधारित सापेक्षता ही पूर्ण ; निश्चय दृष्टि निरपेक्ष और आचरण में सापेक्षता ही-यही जैन दृष्टि।
SR No.002333
Book TitleNitishastra Jain Dharm ke Sandharbh me
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevendramuni
PublisherUniversity Publication Delhi
Publication Year2000
Total Pages526
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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