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________________ चरित्रबल से ही घूमेगा शुभंकर परिवर्तन का चक्र प्रतिदिन का क्रम बन गया। इस भीषण चिंता के असर से राजा का खाया-पिया सब जलकर भस्म हो जाता और वह सूख-सूख कर कांटा होने लगा। __एक दिन राजा उदास मन अपने सिंहासन पर बैठा कुछ सोच रहा था, तभी प्रहरी ने सूचना दी कि एक वृद्ध दार्शनिक उनसे भेंट करना चाहता है। राजा ने उसे तत्काल बुला भेजा। दार्शनिक ने आते ही एक नजर में राजा को देखा और वह व्यग्र हो उठा कि यह राजा तन और मन दोनों से इतना व्यथित क्यों दिखाई दे रहा है? उसने निवेदन किया-'राजन्! आप इतने आतंकित और व्यथित क्यों दिखाई दे रहे हैं? कृपया कारण बताएं तो शायद मैं कोई उपाय सुझा सकू।' अंधा मांगे दो आंख और उसको क्या चाहिए? राजा ने दार्शनिक को अपनी पीड़ा का कारण विस्तार से बताया और उसका समाधान पूछा। दार्शनिक ने कुछ देर विचार किया और प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा-'राजन्! आपकी चिन्ता उचित नहीं। पांच वर्ष तक तो निस्संदेह रूप से आप राज्य करेंगे ही-फिर ऐसी पीड़ा क्यों? पांच वर्ष का समय तो बहुत होता है-इतनी बड़ी अवधि में तो यदि अपना चरित्रबल जगाया जाए तो बहुत कुछ किया जा सकता है। पांच वर्ष तक चिन्ता, निराशा और पीड़ा में ग्रस्त रहकर अवधि बिताने की बजाय अपने व्यक्तित्व को संवार कर तथा चरित्रनिष्ठा को जगा कर आप रचनात्मक कार्य क्यों नहीं करते हैं?' . राजा ने यह सब सुना तो एक ही बार में उसके मन-मानस में जोश भर उठा और कुछ उल्लेखनीय करने की इच्छा जाग उठी। उसने दार्शनिक से पूछा-'आपके कथन से मैं उत्साहित हुआ, अब बतावें कि मुझे क्या करना चाहिए?' दार्शनिक ने स्फूर्ति जगाते हुए उत्तर दिया-'राजन्! वर्ष तक तो आपका अखंड राज्य रहेगा और जैसा आप चाहें कर सकते हैं। मेरा सझाव है कि आप अपने इस राज्याधिकार का सदुपयोग करें और अपने राज्य को स्थाई बनालें।' राजा ने कहा'यही तो मैं चाहता हूँ, परन्तु प्रश्न यह है कि मैं करूं क्या?' दार्शनिक ने राजा को आश्वस्त करते हुए बताया-'आपके हृदय में जब कुछ भी करने का उत्साह और वीर भाव जाग उठा है तो आपको सफलता भी अवश्य प्राप्त होगी। चरित्रनिष्ठा जाग जाने के बाद अप्राप्य कुछ भी नहीं रहता। आपको अपना नया साम्राज्य बनाने का उपक्रम करना होगा। आप कम से कम समय में सीमावर्ती पूरे वन प्रदेश के पेड़ों को कटवा कर साफ करवा दें सो हिंसक वन्य पशु वहां से भाग खड़े होंगे। फिर वहां • नई-नई बस्तियां बसाइए, अपना नया राजमहल भी बनाइए और इस प्रकार पूरे वन प्रदेश को आबाद कर दीजिए। फिर निश्चित हो जाइए।' राजा ने कहा-'यह सब मैं कर भी लूंगा तब भी प्रचलित प्रथा का पालन तो किया ही जाएगा, फिर क्या होगा?' दार्शनिक ने समझाया-'प्रथा के अनुसार जब आपको वन प्रदेश में छोड़ा जाएगा, तब वहां न वन होगा, न हिंसक वन्य पशु, फिर आपको भय कैसा? वहां तो जो आप नई बस्तियां बसाएंगे, वहां के नागरिक उस समय आपका भव्य स्वागत करेंगे और आपको अपना भरपूर समर्थन देंगे। अभी का और नया राज्य मिला कर भला आपका नया साम्राज्य नहीं खड़ा हो जाएगा और क्या आप सम्राट नहीं बन जाएंगे। आप तो बस अपने चरित्रबल को जगाइए और सब कुछ आसान हो जाएगा।' राजा को उपाय जंच गया और दूसरे ही दिन से उसने दार्शनिक के सुझाव के अनुसार कार्य शुरू करवा दिया। तत्काल आदेश से सारा वन प्रदेश साफ करवा दिया गया और फिर वहां कई बस्तियाँ बसाई गई जिनके मध्य में एक सुन्दर नगर का निर्माण 521
SR No.002327
Book TitleSucharitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijayraj Acharya, Shantichandra Mehta
PublisherAkhil Bharatvarshiya Sadhumargi Shantkranti Jain Shravak Sangh
Publication Year2009
Total Pages700
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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