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________________ 194. क्षणभङ्गर शरीर जंपिय इमं सरीरए उरालं आहारोवइयं । एयं पिय अणुपुव्वेण विप्पजहियव्वं भविस्सति ॥ - श्री अभिधान राजेन्द्र कोष [भाग 5 पृ. 957] - सूत्रकृतांग 24/13 आहार से बढ़ा हुआ जो यह उत्तम औदारिक शरीर है, उसे भी क्रमश: अवधि पूरी होने पर छोड़ देना पड़ेगा। 195. प्रत्येक शरीरी संति पाणा पूढोसिता । - श्री अभिधान राजेन्द्र कोष [भाग 5 पृ. 979] - आचारांग 1Aml प्राणी पृथक-पृथक् शरीरों में आश्रित रहते हैं अर्थात् वे प्रत्येक शरीरी होते हैं। 196. आतुर आतुरा परितावेंति । - श्री अभिधान राजेन्द्र कोष [भाग 5 पृ. 979] - आचारांग11/6/49 विषयातुर मनुष्य ही परिताप देते हैं । 197. पूर्णता अपूर्णः पूर्णतामेति । - श्री अभिधान राजेन्द्र कोष [भाग 5 पृ. 991] . - ज्ञानसार 16 'अपूर्ण' पूर्णता प्राप्त करे। (अर्थात् जीव अपूर्ण है, शिव पूर्ण है । अपूर्णता के घोर अंधकार में से पूर्णता के उज्ज्वल प्रकाश की ओर जाएँ। समग्र धर्मपुरुषार्थ का ध्येय पूर्णता की प्राप्ति है।) अभिधान राजेन्द्र कीप में, सूक्ति-सुधारस • खण्ड-5 . 107
SR No.002320
Book TitleAbhidhan Rajendra Koshme Sukti Sudharas Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPriyadarshanashreeji, Sudarshanashreeji
PublisherKhubchandbhai Tribhovandas Vora
Publication Year1998
Total Pages266
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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