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शासन सम्राट : जीवन परिचय.
चातुर्मास पूर्ण होते ही महाराजश्री ढाल की पोल के जीर्णोद्धार हुए देरासर में प्रतिष्ठा करवा कर मातर पधारे । वहां भी उनकी प्रेरणा से जीर्णोद्धार हुए, ५१ देवकुलिका वाले सुमतिनाथ भगवान के देरासर में प्रतिष्ठाविधि अट्ठाई महोत्सवपूर्वक हुई । वहां से महाराजश्री खंभात पधारे और वहां भी उनकी प्रेरणा से जीर्णोद्धार हुए स्थंभन पार्श्वनाथ भगवान के प्राचीन देरासर में अंजनशलाका प्रतिष्ठा महोत्सव धामधूमपूर्वक हुआ । इस प्रसंग से लोगों में धर्मभावना की बहुत वृद्धि हुई और संघ के अतिशय आग्रह के कारण महाराजश्री ने वि.सं. १९८४ का चातुर्मास खंभात में करना स्वीकार किया ।
इसी समयकाल में समेतशिखर के तीर्थ के अधिकार का विवाद भी उपस्थित हुआ । इससे पूर्व सम्पूर्ण पहाड शेठ आणंदजी कल्याणजी की पेढ़ी ने पालगंज के राजा से खरीद लिया था । इस पहाड पर पूजा इत्यादि के अधिकार के संदर्भ में विवाद हुआ । यह विवाद हजारीबाग की कोर्ट में और तत्पश्चात पटना की हाईकोर्ट में गया । महाराजश्रीके मार्गदर्शन के अंतर्गत भुलाभाई देसाई, छोटालाल त्रिकमलाल, केशवलाल, आमथालाल इत्यादि ने कोर्ट में अपनी बात प्रस्तुत करने पर पेढ़ी के पक्ष में निर्णय आया था । कदम्बगिरि का तार्थो द्धार :
वि.सं.१९८५ का चातुर्मास महुवा में निश्चित हुआ था । महाराजश्री विहार करते करते कदम्बगिरि आ पहुंचे । इस तीर्थ के उद्धार के लिए महाराजश्री की तीव्र इच्छा थी । जिनमंदिर के लिए