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शासन सम्राट : जीवन परिचय.
४२ ने वहां पार्श्वनाथ भगवान की चमत्कारी प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई थी । तब से शेरीसा तीर्थ बहुत प्रसिद्ध हुआ । १३ वीं सदी में वस्तुपाल और तेजपाल ने इस तीर्थ में दो देवकुलिका बनाकर एक में नेमीनाथ भगवान की और दूसरी में अंबिका देवी की प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई थी । इस प्रकार उत्तरोत्तर इस तीर्थ की महिमा बढती गई । विक्रम की अठारवीं सदी में मुसलमान आक्रमणकारों ने गुजरात में कुछ हिन्दु और कुछ जैन मंदिरों का वध्वंस किया उससे शेरीसा तीर्थ भी बच नहीं पाया । मंदिर धराशायी हो गया । नगर के लोग नगर छोडकर भाग गए । हजारों यात्रियों से उमडता तीर्थ विरान हो गया । मंदिर के अवशेष काल बितने पर दब गए ।
- इस नष्ट हुए तीर्थ के अवशेष देखने की महाराजश्री ने इच्छा प्रकट की । अतः श्रेष्ठी गोरधनभाई ने पहले से शेरीसा गांवमें पहुंचकर एक परिचित के घर में महाराजश्री और उनके शिष्योंके विराम की व्यवस्था की । महाराज श्री विहार करके शेरीसा पहुंचे । वहां के अवशेष देखते ही उन्हें विश्वास हो गया कि जैन मंदिर के ही अवशेष है । महाराज श्री शिखरों पर पुनः निरीक्षण करने लगे । शाम को वापस आकर वे निकले । उस समय महाराज श्री ने काला, नीला सपाट पत्थर देखा । वह जमीन में दबा हुआ था । उस पर कंडे (गोबर के) थापे गए थे । महाराज श्री को लगा कि इस पत्थर को अवश्य खुदवाकर बाहर निकालना चाहिए । गांव में से मजदूरों को बुलवाकर पत्थर अखंडित निकले इस प्रकार सावधानी से खोदना