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________________ (२) श्रीसिद्धपद परमानन्द-मोक्षलक्ष्मी के निवास रूप अनन्त चतुष्टय से समलंकृत ऐसे 'श्रीसिद्ध भगवन्तों' को मेरा नमस्कार हो । (३) श्रीआचार्यपद कदाग्रहों को दूर करने वाले और सूर्य समान तेज वाले ऐसे 'श्रीप्राचार्य भगवन्तों' को मेरा नमस्कार हो । (४) श्रीउपाध्यायपद सूत्र और अर्थ का विस्तार पमाडने में तत्पर तथा गण-समुदाय को शोभाने में गजराज-हाथी के समान ऐसे 'श्रीउपाध्याय भगवन्तों' को मेरा नमस्कार हो । (५) श्रीसाधुपद सम्यग् प्रकारे संयम-चारित्र की साधना करने वाले, शुद्ध दया और दम इत्यादि गुणों से पवित्र ऐसे 'श्रीसाधु भगवन्तों' को मेरा नमस्कार हो । (६) श्रीसम्यगदर्शनपद श्रीजिनेश्वर-तीर्थंकर भगवन्तों द्वारा प्ररूपित जीवाजीवादि नौ तत्त्वों पर श्रद्धा रूप निर्मल 'श्रीसम्यग्दर्शन' गुण श्रीसिद्धचक्र-नवपदस्वरूपदर्शन-३१४
SR No.002288
Book TitleSiddhachakra Navpad Swarup Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSushilsuri
PublisherSushilsuri Jain Gyanmandir
Publication Year1985
Total Pages510
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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