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________________ (११) तप से शक्ति-ताकत बढ़ती है और आत्मा में दृढ़ इच्छा शक्ति (विल पावर) का विकास होता है । (१२) तप से आत्मा परमात्मा बनता है । (१३) तप से आत्मा मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यवज्ञान एवं केवलज्ञान भी प्राप्त करता है। (१४) तप से आत्मा की पौद्गलिक भावना विनष्ट हो जाती है तथा आत्मरमणता उत्पन्न होती है । (१५) तप से स्पर्शेन्द्रियादि पांचों इन्द्रियां काबू में आती है। (१६) तप से आत्मा को ऊर्वीकरण की अद्भुत शक्ति प्राप्त होती है। . (१७) तप से जगत में प्रत्येक पदस्थान का, प्रत्येक शक्ति-सामर्थ्य का तथा प्रत्येक प्रतिष्ठा का शुभागमन होता है। (१८) तप से इष्ट की सिद्धि होती है और अपना कार्य निर्विघ्न सफल होता है । विघ्नों की उपशान्ति हो जाती है तथा उपसर्ग-उपद्रव आदि का विनाश होता है । (१६) जैन शासन का लोकोत्तर तप आत्मा को तपाता है, इतना ही नहीं किन्तु प्रात्मा के असंख्यात प्रदेशों पर भीसिद्धचक्र-नवपदस्वरूपदर्शन-३०५
SR No.002288
Book TitleSiddhachakra Navpad Swarup Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSushilsuri
PublisherSushilsuri Jain Gyanmandir
Publication Year1985
Total Pages510
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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