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________________ संयमी - साधुवेश वाले को ही होता है । ऋजुमति ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात् चला जाता है, लेकिन विपुलमति ज्ञान तो उसी भव में पंचम केवलज्ञान प्राप्त हो तब तक रहता है । मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान और मनः पर्यवज्ञान ये चारों ज्ञान ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से आत्मा को छद्मस्थ अवस्था में प्राप्त होते हैं । इसलिये शास्त्र में मत्यादि चारों ज्ञानों को छाद्मस्थिक ज्ञान कहा है । (५) केवलज्ञान तीनों काल के लोक और अलोक का निखिल स्वरूप हस्त में रहे हुए आँवले की भाँति प्रत्यक्ष रूप में जो जोहता है, वह ज्ञान ' केवलज्ञान' कहा जाता है । आत्मा को ज्ञानावरणीय कर्म का जब सर्वथा क्षय हो जाता है तब यह केवलज्ञान प्राप्त होता है । इसलिये यह ज्ञान ' क्षायिकज्ञान' भी कहा जाता है । मत्यादि चारों ज्ञानों के पश्चाद् यह ज्ञान होता है, इसलिये इसको 'पंचमज्ञान' भी कहा है । सर्व ज्ञानों में श्रेष्ठ- सर्वोत्तमसर्वोत्कृष्ट होने से उसको 'सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम या सर्वोत्कृष्ट ज्ञान' तरीके भी सम्बोधते हैं । सभी ज्ञानों के अन्त में यह ज्ञान होता है, इसलिये इसे 'अन्तिम ज्ञान' भी कहते सि - १३ श्री सिद्धचक्र - नवपदस्वरूपदर्शन - १८६
SR No.002288
Book TitleSiddhachakra Navpad Swarup Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSushilsuri
PublisherSushilsuri Jain Gyanmandir
Publication Year1985
Total Pages510
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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