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________________ अदत्ताणि-अदत्तादान, समाययंतो-ग्रहण करता हुआ, रूवे-रूप के विषय में, अतित्तो-अतृप्त, दुहिओ-दुःखित होता है, अणिस्सो-अनाश्रित। मूलार्थ-जीव झूठ बोलने के पीछे अथवा पहले तथा बोलते समय दुःखी होता है तथा अदत्त का ग्रहण करता हुआ और रूपविषयक अतृप्ति को प्राप्त होता हुआ दुःखी तथा अनीश्वर होता है। टीका-असत्य भाषण करने वाला जीव किसी समय भी समाधि-निराकुलता को प्राप्त नहीं होता, यह इस गाथा का भाव है। जैसे कि असत्य बोलने के पीछे उसे पश्चात्ताप करना पड़ता है और असत्य बोलने से पहले भी उसको भय-कंपादि अवश्य उत्पन्न होते हैं तथा असत्य भाषण के समय पर भी वह निश्चिन्त नहीं होता। कारण यह है कि उसको यह भय लगा रहता है कि कहीं उसका यह असत्य-भाषण व्यक्त न हो जाए; इसलिए मृषावादी जीव कभी सुख को प्राप्त नहीं होता। जिनसे जन्म और मरण का अन्त नहीं आता इस प्रकार के कर्मों का आचरण करने वाला जीव 'दुरन्त' संज्ञा वाला होता है। इसी प्रकार अदत्त का ग्रहण करने वाला रूपलोलुप जीव भी कभी सुखी नहीं हो सकता। उपलक्षण से मैथुन आदि के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार से दु:ख का विचार कर लेना। एवं असत्यभाषी और चौर्यकर्म में प्रवृत्ति रखने वाला रूपलोलुप जीव अनीश्वर अर्थात् साहाय्य-रहित हो जाता है-उसका कोई सहायक नहीं बनता। अब प्रस्तुत विषय का निगमन करते हुए शास्त्रकार कहते हैं कि रूवाणुरत्तस्स नरस्स एवं, कत्तो सुहं होज्ज कयाइ किंचि ? • तत्थोवभोगे वि किलेसदुक्खं, निव्वत्तई जस्स कएण दुक्खं ॥ ३२ ॥ रूपाणुरक्तस्य नरस्यैवं, कुतः सुखं भवेत्कदापि किञ्चित् ? - तत्रोपभोगेऽपि क्लेशदुःखं, निवर्तयति यस्य कृते दुःखम् ॥ ३२ ॥ पदार्थान्वयः-एवं-इस प्रकार, रूवाणुरत्तस्स-रूप में अनुरक्त, नरस्स-नर को, कत्तो-कहां से, सुहं-सुख, होज्ज-होवे, कयाइ-कदाचित्, किंचि-किंचिन्मात्र, तत्थ-वहां पर, उवभोगे वि-भोगने के समय पर भी, किलेस-क्लेश और, दुक्खं-दुःख को, निव्वत्तई-उत्पन्न करता है, जस्स-जिसके, कए-लिए, दुक्खं-दु:ख को, ण-वाक्यालंकार में है। ___ मूलार्थ-रूप के विषय में अनुरक्त पुरुष को सुख कहां से हो ? उसको तो कदाचित् और किंचिन्मात्र भी सुख नहीं हो सकता। उस रूप के विषय में अनुरक्त होने वाले जीव को उपभोग के समय पर भी क्लेश और दुःख का ही सम्पादन करना पड़ता है तथा उपभोग के सम्पन्न होने पर भी तृप्ति के न होने से दुःख ही उपलब्ध होता है। ____टीका-रूपादि के लोलुप जीव को कभी और किंचिन्मात्र भी सुख की उपलब्धि नहीं होती। तृप्ति न होने से सुख के बदले दुःख ही प्राप्त होता है। तथा जब रूप के उपभोग का समय आता है तब भी पर्याप्त सामग्री के न मिलने से क्लेश और दुःख ही उत्पन्न होते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि उत्तराध्ययन सूत्रम् - तृतीय भाग [२३९] पमायट्ठाणं बत्तीसइमं अज्झयणं
SR No.002204
Book TitleUttaradhyayan Sutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj, Shiv Muni
PublisherJain Shastramala Karyalay
Publication Year2003
Total Pages506
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size11 MB
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