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________________ यथा—साधु कभी मिथ्या भाषण न करे तथा निश्चयात्मक भाषा और दुष्ट भाषा का कभी भी व्यवहार न करे एवं छल-कपट युक्त वचनों का सदा के लिए परित्याग कर दे। मिथ्या भाषण, निश्चयात्मक भाषण, सावध भाषण और छल-कपटमय भाषण ये सब सत्य के आचार में विघ्नरूप दोष हैं, इसलिए सत्यनिष्ठ भिक्षु के लिए इनका सर्वथा त्याग ही उचित है, क्योंकि इनके त्याग के बिना वाणी में कभी विशुद्धता नहीं आती। वाणी की विशुद्धि अर्थात् निर्दोषता ही वस्तुतः वाग्विनय है। अतः विनय-धर्म में प्रवृत्त भिक्षु सदा निर्दोष भाषा का ही व्यवहार करे। भाषागत दोषों में मिथ्या भाषण—झूठ बोलना सबसे बड़ा दोष है। निश्चयात्मक भाषण (जैसे मैं यह कार्य आज ही अवश्य करूंगा, ऐसा वचन) कहने की साधु को इसलिए मनाही की गई है कि समय-समय पर अनेक विघ्न उपस्थित होते जाते हैं, कौन जाने, कहा हुआ. वचन पूरा भी हो सकेगा या नहीं, इसलिए भिक्षु को भविष्य में होने वाले कार्यों के विषय में कभी निश्चयात्मक वचन नहीं कहना चाहिए। एवं सावध भाषा (अशुद्ध भाषा, दोषयुक्त भाषा) के व्यवहार से भी साधु की सत्यनिष्ठा में विकार उत्पन्न करने के साथ-साथ आत्मा में भी कलुषितता पैदा करता है। तात्पर्य यह है कि ये सब दोष, वाणी-विषयक विनयाचार के पूर्ण विरोधी हैं, अतः विनयशील भिक्षु इनका अपनी वाणी में कभी समावेश न होने दे, इसी में उसका श्रेय है। अब फिर इसी विषय को स्पष्ट करते हुए कहते हैं न लवेज्ज पुट्ठो सावज्जं, न निरठं न मम्मयं । अप्पणट्ठा परट्टा वा, उभयस्सन्तरेण वा ॥ २५ ॥ न लपेत् पृष्टः सावा, न निरर्थं न मर्मकम् । आत्मार्थ परार्थं वा, उभयस्यान्तरेण वा ||.२५ || पदार्थान्वयः—पुट्ठो—पूछा हुआ, सावज्जं—सावध वचन को, न लवेज्ज—न बोले, न निरटुं—न निरर्थक वचन बोले, न मम्मयं—न मर्मयुक्त वचन चोले, अप्पणट्टा—अपने लिए, वा—अथवा, परट्ठा—पर के लिए, उभयस्स—दोनों के लिए, वा—अथवा, अंतरेण—बिना प्रयोजन के न बोले। .. मूलार्थ पूछने पर भी सावध वचन न बोले, निरर्थक वचन न बोले, मर्मयुक्त वचन न बोले, अपने लिए एवं दूसरों के लिए तथा दोनों के लिए, और बिना प्रयोजन के भी न बोले । टीका—इस गाथा में साधु के लिए वचन-गुप्ति के संरक्षण का उपदेश दिया गया है। साधु ऐसी भाषा का कभी व्यवहार न करे जो सावध अर्थात् दोषयुक्त हो तथा इस प्रकार की भाषा भी न बोले जिसके बोलने से कोई भी अर्थ सिद्ध न होता हो और दूसरों के मर्म को प्रकट करने वाली भाषा का भी व्यवहार न करे, क्योंकि मर्मयुक्त भाषा के बोलने से कभी-कभी बड़े-बड़े अनर्थ हो जाते हैं। अनेक बार तो मृत्यु तक की नौबत आ जाती है। इसके लिए सावध भाषा, निरर्थक भाषा और मर्म-युक्त भाषा का अपने तथा दूसरों के लिए भी विचारशील साधु कभी व्यवहार न करे | सारांश यह है कि तत्त्व का जिज्ञासु साधु पुरुष संयत भाषा का व्यवहार करता हुआ सदा सत्य, श्री उत्तराध्ययन सूत्रम् / 81 / विणयसुयं पढमं अज्झयणं
SR No.002202
Book TitleUttaradhyayan Sutram Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj, Shiv Muni
PublisherJain Shastramala Karyalay
Publication Year2003
Total Pages490
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size11 MB
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