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________________ पिंडनियुक्ति यदि एक बार लाकर उसे शाम के लिए रख दिया जाता है तो ठंडा भोजन आहार करने की अनिच्छा का हेतु भी बन सकता है अतः बेले का तप करने वाले को दो बार भिक्षा जाना अनुज्ञात है। यदि उपवासकर्ता तीसरी बार भिक्षार्थ जाता है तो उसे लघुमास (पुरिमार्ध), चौथी बार जाने पर गुरुमास (एकासन), पांचवीं बार जाने पर चारलघु (आयम्बिल), छठी बार जाने पर चारगुरु (उपवास), सातवीं बार जाने पर छहलघु, आठवीं बार भिक्षार्थ जाने पर छहगुरु, नौवीं बार जाने पर छेद, दसवीं बार जाने पर मूल, ग्यारहवीं बार जाने पर अनवस्थाप्य तथा बारहवीं बार भिक्षार्थ जाने पर पाराञ्चिक प्रायश्चित्त की प्राप्ति होती है। इसी प्रकार बेले वाले के लिए बारहवीं बार भिक्षार्थ जाने पर पाराञ्चिक प्रायश्चित्त का विधान है। अष्टमभक्तिक- तेले वाले के लिए चौथी बार से प्रारम्भ करके तेरहवीं बार भिक्षार्थ जाने पर पाराञ्चिक प्रायश्चित्त की प्राप्ति होती है । ४६ दिगम्बर परम्परा के अनुसार सूर्योदय की तीन घड़ी के बाद तथा सूर्यास्त की तीन घड़ी पहले का मध्यकाल मुनि के लिए आहार का काल होता है। मध्य काल में तीन मुहूर्त आहार करना उत्कृष्ट, दो मुहूर्त करना मध्यम तथा एक मुहूर्त आहार करना जघन्य है। एक मुहूर्त्त आहार करना उत्कृष्ट आचरण, दो मुहूर्त्त करना मध्यम आचरण तथा तीन मुहूर्त्त तक आहार करना जघन्य आचरण है । ' एषणा एवं उसके दोष साधु का चलना, बोलना, खाना, उपकरण आदि रखना तथा उत्सर्ग- ये सभी क्रियाएं गृहस्थ से भिन्न होती हैं अतः उसकी इन सम्यक् क्रियाओं को समिति कहा गया है। पांच समितियों में भिक्षाचर्या से सम्बन्धित समिति का नाम एषणा है। जैन आचार्यों ने शुद्ध भिक्षा वृत्ति को बहुत महत्त्व दिया । व्रत, शील आदि गुण भिक्षाचर्या या एषणा की विशुद्धि पर ही स्थित रहते हैं। भाष्य साहित्य में उल्लेख मिलता है कि जहांपुर: कर्म आदि एषणा के दोष लगें, वहां साधु को भिक्षार्थ नहीं जाना चाहिए। एषणा में अजागरूकता बीसवां असमाधिस्थान है। इसका स्पष्टीकरण करते हुए टीकाकार अभयदेवसूरि कहते हैं कि जो एषणा में उपयुक्त नहीं होता, वह हिंसा में प्रवृत्त होता है। जब दूसरे मुनि उसे सावधान करते हैं, तब वह कलह में प्रवृत्त होकर स्वयं असमाधिस्थ रहता है तथा दूसरों की असमाधि में निमित्तभूत बनता है ।' आचार्य बट्टकेर के अनुसार जो भिक्षा, वचन और हृदय - इन तीनों का शोधन करके विचरण करते हैं, वे जिनशासन में सुस्थित साधु कहलाते हैं। आचार्य कुंदकुंद ने तो यहां तक कह दिया कि जो मुनि शुद्ध भिक्षा की एषणा करता है, वह आहार करता हुआ भी अनाहारी है।' उत्तराध्ययन में स्पष्ट उल्लेख है कि जो औद्देशिक, क्रीत १. बृभा १७००, १७०१, टी पृ. ५००। २. मूला ४९२, टी पृ. ३७८, ३७९ । ३. मूला १००५ । ४. बृभा ५४४१; जहियं एसणदोसा, पुरकम्माई न तत्थ गंतव्वं । ५. दश्रु १/३ । Jain Education International ६. समटी पृ. २६; अनेषणां न परिहरति, प्रेरितश्चासौ साधुभिः कलहायते..., चात्मपरयोरसमाधिकरणादसमाधिस्थानम् । ७. मूला १००६ । ८. प्रव ३/२७ । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001945
Book TitleAgam 41 Mool 02 Pind Niryukti Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2008
Total Pages492
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_pindniryukti
File Size9 MB
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