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________________ पिण्डनियुक्ति : एक पर्यवेक्षण भिक्षावृत्ति एवं भीख में अंतर साधु की भिक्षाचरी और दीन-हीन व्यक्ति की भीख में जमीन-आसमान का अंतर है। प्रथम तो भिक्षुक की भीख में कोई नियम-प्रतिबद्धता नहीं होती, वह दीन स्वरों में एक के बाद दूसरे घर से मांग करता रहता है, जबकि साधु अदीनभाव से (दश ५/२/२६) आत्मसम्मान के साथ संयमयोगों की सिद्धि हेतु दूसरों के लिए कृत एवं निष्पन्न भिक्षा ग्रहण करता है। भिक्षुक भविष्य की चिन्ता के लिए भी धन अथवा पदार्थ का संग्रह करता है, जबकि साधु प्रातःकाल लाई खाद्य वस्तु का शाम के लिए भी संग्रह नहीं करता अर्थात् प्रथम प्रहर में लाई हुई भिक्षा का वह अंतिम प्रहर में उपभोग नहीं कर सकता।' साधु मान, मनुहार और हठपूर्वक थोड़ा-थोड़ा ग्रहण करता है, जबकि भिक्षुक देय वस्तु सारी लेने पर भी और अधिक लेने की आकांक्षा रखता है। साधु अलाभो त्ति न सोएज्जा-अर्थात् भिक्षा न मिलने पर दुःख की अनुभूति न करके समभाव में स्थित रहता है, किसी की अवहेलना नहीं करता, जबकि भिक्षुक भीख न मिलने पर कभी-कभी उत्तेजित होकर अनर्गल प्रलाप भी करने लगता है। साधु अनेक घरों में घूमकर श्रमपूर्वक भिक्षा ग्रहण करता है, जबकि भिखारी एक घर से भी अपनी उदरपूर्ति कर लेता है। महावीर ने तो साधु के स्वाभिमान को इतना जीवन्त रखा है कि यदि भिखारी या अन्य भिक्षाचर घर में पहले से आए हुए हों तो मुनि उस घर में प्रवेश न करे। मुनि के लिए भिक्षा कितनी बार आगमों के अनुसार नित्यभक्तिक मुनि के लिए दिन का तीसरा प्रहर भिक्षा का काल माना गया है। दशाश्रुतस्कन्ध में २० असमाधि-स्थानों में एक असमाधि-स्थान यह है कि सूर्योदय से सूर्यास्त तक खाते रहना। एगभत्तं च भोयणं (दश ६/२२) उल्लेख साधु के आहार-संयम की ओर संकेत करता है। उपवास-कर्ता मुनि को भी एक बार ही भिक्षार्थ जाना अनुज्ञात है लेकिन यदि आहार-पानी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिला हो तो दो बार जाया जा सकता है। बेले की तपस्या वाले के लिए दो गोचरकाल तथा तेले की तपस्या वाले के लिए तीन गोचरकाल अनुज्ञात हैं। तेले से अधिक तपस्या करने वाले के लिए तीन गोचरकाल अनुज्ञात हैं।' बेले की तपस्या वाला दो बार भिक्षार्थ इसलिए जा सकता है क्योंकि बेले आदि के तप में आंत सिकुड़ जाती है अत: अधिक बार खाने से पुन: बेला आदि तप करने का बल प्राप्त हो जाता है तथा आहार भी ठंडा नहीं होता। १. निभा ४१४१। २. दश ५/२/६। ३. दश ५/२/१२,१३। ४. उ २६/१२ ; तइयाए भिक्खायरियं । ५.दश्रु १/३। ६. बृभा १६९८, टी पृ. ४९९, दश्रु ८/६०। ७. बृभा १६९७, १६९८, टी पृ. ४९९ । ८. बृभा १६९९, टी पृ. ४९९, ५००। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001945
Book TitleAgam 41 Mool 02 Pind Niryukti Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2008
Total Pages492
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_pindniryukti
File Size9 MB
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