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________________ १७० पिंडनियुक्ति चपटा हो जाता है और उसको दूध पीने में कठिनाई होती है, कृश धात्री कम क्षीर वाली होती है। कूर्पर स्तन वाली धात्री का स्तनपान करने से बालक सूचीमुख वाला अर्थात् लम्बे मुख वाला हो जाता है। १९८/८. अभिनव धात्री जिस वर्ण से उत्कट होती है, मुनि उसकी गर्दा करता है और परानी धात्री जिस वर्ण वाली होती है, उसको वह अतिशय प्रशस्त बताता है। यदि समान वर्ण वाली होती है तो पहले वाली को अत्यन्त प्रशस्त वर्ण वाली तथा दूसरी अभिनव धात्री को दुर्वर्ण वाली बताता है। (मुनि से इस प्रकार सुनकर यदि गृहस्वामी नई धात्री को मुक्त कर पुनः पुरानी धात्री को रखता है तो यह कथन धात्री-दोष समापन्न होता है।) १९८/९. धात्री पद से मुक्त करने पर वह अभिनव धात्री प्रद्वेष युक्त हो सकती है, वह साधु पर गलत अभियोग भी लगा सकती है कि यह साधु उद्भ्रामक-जार है। पुरानी धात्री सोचती है कि अभिनवधात्री की भांति कभी यह मेरे जीवन में भी विघ्न उपस्थित कर सकता है अत: वह साधु के लिए विष आदि का प्रयोग कर सकती है। दूसरी भी विष आदि का प्रयोग कर सकती है। १९८/१०. इसी प्रकार सुत के लिए माता के समान शेष मज्जनधात्रियों आदि के विषय में स्वयं करने और करवाने के संदर्भ में समझना चाहिए। धनाढ्य घरों से मज्जनधात्री आदि को निकालने पर प्रद्वेष आदि पूर्वोक्त सारे दोष समझने चाहिए। १९८/११. (मुनि घर में प्रविष्ट होकर गृहस्वामिनी से कहता है-) 'यह बालक भूमि पर लुट रहा है इसलिए धूल से खरंटित है। इसको स्नान कराओ अथवा मैं करवाऊं।' वह मुनि मज्जनधात्री के दोष बताते हुए कहता है-'बालक को अत्यधिक पानी से स्नान कराने से वह 'जलभीरु' हो जाता है, निर्बलदृष्टि वाला हो जाता है अथवा रक्ताक्ष हो जाता है।' १९८/१२. मज्जनधात्री बालक की तैल से मालिश करके हाथों से संबाधन करती है तथा फिर पिष्टि आदि द्रव्यों से उद्वर्तन करके उसे स्नान कराती है। वह बालक के शरीर को शुचीभूत कर मंडनधात्री को सौंप देती है। १९८/१३. (भिक्षा के लिए गया हुआ मुनि घर में आभूषण रहित बालक को देखकर गृहस्वामिनी से कहता है-) 'तुम इषुक'-तिलक आदि आभरणों से इस बालक को मंडित करो। यदि तुम ऐसा नहीं कर सकती तो मैं इसको विभूषित करता हूं।' (वह अभिनव नियोजित मंडनधात्री के दोष बताता हुआ कहता है-) 'देखो, इस धात्री ने हाथ अथवा गले में पहनने योग्य आभरणों को पैरों में पहनाया है।' १९८/१४. यह क्रीड़नधात्री उच्च स्वर वाली है इसलिए बालक 'छुन्नमुख' क्लीबमुख वाला होगा अथवा यह धात्री मृदुवाणी वाली है इसलिए बालक अव्यक्त बोलने वाला होगा अथवा वह श्राविका को प्रभावित १. मवृ प. १२४; इषुकाकारमाभरणम् अन्ये तिलकमित्याहुः- इषुक के आकार का आभरण, कुछ आचार्य इसे तिलक भी कहते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001945
Book TitleAgam 41 Mool 02 Pind Niryukti Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2008
Total Pages492
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_pindniryukti
File Size9 MB
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