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________________ ८२ २५३. पासोलित्तकडाहे, परिसाडी नत्थि तं पि य विसालं । सो वि य अचिरच्छूढो', उच्छुरसो नातिउसिणो यरं ॥ ५५२ ॥ २५३/१. उसिणोदगं पिर घेप्पति, गुल- रसपरिणामिगं अणच्चुसिणं । जं च अघट्टियकण्णं, घट्टियपडणम्मि मा अग्गी ॥ ५५३ ॥ २५३ / २. पासोलित्तकडाहे, सोलसभंगविकप्पा, २५३/३. पयसमदुगअब्भासे, २५४. २५५. २५६. २५७. २५८. १. अचिरं छूढो (क, स) । २. जीभा १५३४ । Jain Education International चुसि पढ · ३. व (क) । ४. तु न उसिणा (ला, ब), तु णच्चु (स) । ५. साडि घट्टंतो ( अ, क, बी) । माणं भंगाण एगंतरियं लहुगुरु, दुगुणा दुविधविराधण उसिणे, छड्डण वाउक्खित्ताऽणंतर, परंपरा पप्पडिय ६. २५३ / १-३- ये तीनों गाथाएं २५३ वीं गाथा की व्याख्या प्रस्तुत करने वाली हैं अतः भाष्य की होनी चाहिए। गा. २५३ / ३ सभी हस्तआदर्शों में अप्राप्त है अतः भाष्य की अथवा बाद में किसी आचार्य द्वारा जोड़ी गई प्रतीत होती है। आचार्य मलयगिरि ने इसकी व्याख्या की है। अवचूरि में इसकी संक्षिप्त व्याख्या है, पर गाथा नहीं है। वहां इसे नियुक्ति क्रमांक में परिगणित करने का कारण संपादक ने पादटिप्पण में प्रस्तुत करते हुए कहा है- " एषा हरितादी तरिया, परंपरं पिढरगादिसु पिट्ठणंतर, भरगे कुउबाइसू‍ पूपाइ सच्चित्ते १३ अच्चित्ते, मीसग पिहितम्मि होति आदितिगे पडिसेधो, 'चरिमे भंगम्मि भयणा जह चेव य निक्खित्ते, संजोगा चेव होंति एमेव य पिहितम्मि वि नाणत्तमिणं 'अंगार- धूवियादी १५, अणंतरो १६ संतरो तत्थेव अतिर१७ वाऊ, परंपरं वत्थिणा ७. ८. ९. १०. अपरिसाऽघट्टते" | सेसेसु ॥ ५५४॥ न तेसिमा दुगुणा य हाणी य भाणभेदो य । " रयणा । वामेसु ॥ ५५५ ॥ For Private & Personal Use Only वत्थी' ॥ ५५६ ॥ पिंडनिर्युक्ति वणम्मि । इतरा ॥ ५५७ ॥ दारं ॥ चउभंगो । उ १४ ॥ ५५८ ॥ भंगा उ । ततियभंगे ॥ ५५९ ॥ सरावादी । पिहिते ॥ ५६० ॥ गाथा श्रीमलयगिरिपादैरंगीकृता व्याख्याता च अतोऽस्या क्रमांकोपस्थिति: न्याय्यैव (अव) ।" घट्टण (ला) । 'परे ( अ, बी), 'परं ( स ) । वत्थि त्तिविभक्तिलोपाद् वस्तौ (मवृ) । हरियाय ( अ, बी), ११. तरया (स), तरए (क) । १२. कूउ (बी), कूडगाइसू (ला, ब), कुंडगातिसु (स) । १३. सच्चित्ते इत्यादौ सप्तमी तृतीयार्थे (मवृ) १४. गहणे आणाय दोसा उ ( स ) । १५. अंगारु (स), धूमियाई (ला, ब)। १६. तरा (ला)। १७. अथिर ( ब ) । १८. परुप्परं ( अ, बी) । www.jainelibrary.org
SR No.001945
Book TitleAgam 41 Mool 02 Pind Niryukti Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2008
Total Pages492
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_pindniryukti
File Size9 MB
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