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पिंडनियुक्ति २१९/१२. रायगिहे' य कदाई, निम्महिलं२ नाडगं नडागच्छी।
‘ता उ' विरहम्मि मत्ता'५, उवरिगिहे दो वि पासुत्ता ॥ ४७७ ॥ २१९/१३. वाघातेण नियत्तो', दिस्स विचेला विराग संबोधी।
इंगितनाते पुच्छा, 'पजीवणं रट्ठपालं ति ॥ ४७८ ।। २१९/१४. 'इक्खागुवंस भरहो'९, - आदंसघरे य केवलालोओ।
हारादिखिवण° गमणं१९, उवसग्ग न सो 'नियत्तो त्ति'१२ ॥ ४७९ ॥ २१९/१५. तेण समं पव्वइता, पंच 'नरसता उ'३ नाडगे डहणं।
गेलण्ण-खमग- पाहुण, थेरा दिट्ठा य 'बितियं तु'१५ ॥ ४८० ॥ दारं ॥ २२०. लब्भंतं पि न गिण्हति१६, अन्नं 'अमुगं ति'१७ अज्ज लब्भामो८ ।
भद्दरसं ति व९ काउं, गिण्हति खद्धं२० सिणिद्धादी॥ ४८१ ॥ २२०/१. चंपा छणम्मि२९ घेच्छामि, मोदगे ते य२२ सीहकेसरए ।
पडिसेध धम्मलाभ, काऊणं२३ सीहकेसरए२ ॥ ४८२ ॥ २२०/२. सड्डड्वरत्त केसरभायणभरणं च पुच्छ पुरिमड्डे।
उवओग 'संत चोदण'२५, 'साहु त्ति'२६ विगिंचणा२७ नाणं२८ ॥ ४८३ ॥ दारं ॥
१. “घरे (अ, बी, क, मु)। २. “हिलयं (ला, ब), निम्महलं (क)। ३. नाडुगं (अ, बी)। ४. ता य (अ, बी, मु), ताव (जीभा १४०५)। ५. ता विरहम्मि य मत्ता (क)। ६. गेहे (ला, ब, स)। ७. नियंतो (स), नियत्ती (क)। ८. परजीवाणं रिद्धिवाल त्ति (अ, बी)। ९. इक्खाग भरहवंसो (क)। १०. 'खवणे (ब), 'खवण (ला), खेवण (स)। ११. गहणं (मु, क)। १२. नियत्त त्ति (क), तु. जीभा १४०९। १३. “सयत्ति (अ, बी, मु), 'सइ त्ति (क)। १४. दट्ठा (अ, बी)। १५. बीय त्ति (अ, बी), बीयं तु (मु),
बितिय व्व (स), द्र टिप्पण २२०/१, कथा के
विस्तार हेतु देखें परि. ३, कथा सं. ३८। १६. गिण्हए (स)। १७. गत्ति (अ)।
१८. घेच्छामि (क, मु, जीभा १४१३)। १९. x (अ, बी)। २०. खिद्धं (अ, बी)। २१. सणम्मि (ला)। २२. वि (मु)। २३. काऊण य (अ, बी)। २४. २२०/१,२-ये दोनों गाथाएं लोभपिंड से सम्बन्धित
कथा का संकेत करने वाली हैं। नियुक्तिकार गाथा २१६ में इस कथा का संकेत कर चुके हैं अतः कथा का विस्तार करने वाली ये दोनों गाथाएं भाष्य की होनी चाहिए। इसी प्रकार क्रोध, मान
और मायापिंड से संबंधित कथाओं की गाथाएं भी गा. २१६ में संदिष्ट है अतः कथा का विस्तार करने वाली ये गाथाएं भाष्य की होनी चाहिए। २१८/१, २१९/ १-१५ गाथाएं निगा के मूल
क्रमांक में नहीं जोड़ी गई है। २५. चंत चोयण (ब), चंद जोयण (अ, जीभा)। २६. साहू त्ति (बी)।
__ "चणे (मु, जीभा १४१७)। २८. कथा के विस्तार हेतु देखें परि. ३,कथा सं. ३९।
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