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________________ २६६ सानुवाद व्यवहारभाष्य प्रवर्तिनी की याचना की। इसका वर्णन छठे उद्देशक (गाथा अथवा 'चउण्हमेगयरं' इस प्रकार भी होता है२८२६ आदि) में पहले किया जा चुका है। उसके लिए व्यवस्था १. समनोज्ञ संयतों का समुदाय न करने वाले प्रवर्तिनी, उपाध्याय तथा आचार्य को पूर्वोक्त २. अमनोज्ञ संयतों का समुदाय दंड-प्रायश्चित्त आता है। यहां भी वही ज्ञातव्य है। ३. समनोज्ञ संयतियों का समुदाय २८७१. तं पुण संविग्गमणो, तत्थाणीतं तु जइ न इच्छेज्जा। ४. अमनोज्ञ संयतियों का समुदाय नियगा उ संजतीओ ममकारादीहि कज्जेहिं।। इनमें से कोई एक। उस संविग्नमानसवाली आभीरी श्रमणी को वहां ले जाने पार्श्वस्थाममत्व, प्रकृति से सर्वजनद्वेष्या, प्रवर्तिनी के लिए पर भी निजक अर्थात् स्वगण की श्रमणियां ममकार आदि कारणों अचक्षुःकांता और गुरु आदि के साथ प्रतिस्पर्धा ये चार कारण से उसको लेना न चाहें। हैं। इन चारों कारणों में से एक के आधार पर वह अन्य २८७२. पासत्थिममत्तेणं, पगती वेसा अचक्खुकंता वा। सांभोगिकी अथवा असंभोगिकी को दी जाती है। अथवा गुरुगणतण्णीयस्स तु, नेच्छंती पाडिसिद्धी या॥ अध्वनिर्गता, पुत्री का स्मरण करती हुई, शत्रुसेना का आगमन २८७३. ओमाणं नो काहिति, संखलिबद्धा व ताउ सव्वाओ। अथवा देशभंग तथा शिक्षा की मार्गणा-इन चार कारणों में से मा होहिति सागरियं, सीदति च उज्जतं नेच्छे॥ किसी एक के आधार पर अन्य सांभोगिकी अथवा असांभोगिकी (ममत्व के कारण ये हैं।) यह जहां से आई है वह पार्श्वस्था को दी जाती है। हमारे पर कुपित न हो, इस पार्श्वस्थों के ममत्व के कारण, यह २८७७. सेहि त्ति नियं ठाणं, एवं सुत्तम्मि जंतु भणियमिणं। प्रकृति से द्वेष्य है, प्रवर्तिनी के लिए अचक्षुकांता है अर्थात् एवं कयप्पयत्ता, ताधि मुयंता उ ते सुद्धा। प्रवर्तिनी उसको देखना भी नहीं चाहती, अथवा प्रवर्तिनी गुरु से यदि असांभोगिकी प्रवर्तिनी भी उसे ग्रहण करना न चाहे कुपित है अथवा गुरु को गच्छ से ऊपर नहीं जानती अथवा उस तो सूत्र में जो कहा-'सेहित्ति नियंठाण'-इसका अर्थ हैं कि प्रयत्न निग्रंथी के ज्ञातिजनों के साथ प्रवर्तिनी की प्रतिस्पर्धा है अथवा ये करने पर भी यदि संयतियां लेना स्वीकार नहीं करती है तो उसे सभी साध्वियां शृंखलाबद्ध हैं, परस्पर स्वजन हैं अतः यह हमारा मुक्त करने में भी वे शुद्ध हैं, कोई दोष नहीं है। अपमान करेगी इसलिए इसको दीक्षित न करें। यह सागारिक ही २८७८. संभोइउं पडिक्कमाविया कप्पति अयं पि संभोगो। रहे। वह खिन्न होती है फिर भी वे उस उद्यमशील साध्वी को सो उ विवक्खे वुत्तो, इमं तु सुत्तं सपक्खम्मि। अपने में नहीं मिलातीं। अनंतर सूत्र में कहा है कि प्रतिक्रमण कराने के बाद संभोज २८७४. भणति वसभाभिसेए, आयरिकुलेण गणेण संघेण। कल्पता है। इस सूत्र के द्वारा भी संभोज कहा जा रहा है। पूर्वसूत्र लहुगादि जाव मूलं, अण्णस्स गणो य दातव्वो॥ में विपक्ष-संयती का संभोज बताया था। यह सूत्र सपक्ष अर्थात् २८७५. एवं पुव्वगमेणं, विगिंचणं जाव होति सव्वासिं। संयत के संभोज का वाचक है। देंतण्ण मणुण्णाणं, अमणुण्ण चउण्हमेगतरं॥ २८७९. संभोगो पुव्वुत्तो, पत्तेयं पुण वयंति पडिएक्कं । वृषभ के कहने पर, अभिषेक अर्थात् उपाध्याय के कहने __तप्पंते समणुण्णे, पडितप्पणमाणुतप्पं च।। पर अथवा आचार्य, कुल और गण के कहने पर प्रवर्तिनी उसको संभोज पूर्व उक्त है अर्थात् निशीथाध्ययन में उक्त है। स्वीकार नहीं करती है तो चतुर्लघु प्रायश्चित्त से क्रमशः मूलपर्यंत उसका पुनः कथन किया जा रहा है। जो प्रत्येक का विसंभोज प्रायश्चित्त प्राप्त होता है। संघ के कहने पर भी प्रवर्तिनी उसको करता है वह तप्त होता है। समनोज्ञ तप्त होता है और दूसरा लेना नहीं चाहती तो प्रवर्तिनी से गण का अपहरण कर, अन्य अनुतपन करता है अर्थात् उसके प्रति तपन करता है। प्रवर्तिनी को गण दे देना चाहिए। इसमें पूर्वगम-पूर्वविकल्प के २८८०. सागारिए गिहा निग्गते य वडघरिय जंबुधरिए य। अनुसार परित्याग तब तक करते रहना है जब तक सभी उस धम्मिय गुलवाणियए, हरितोलित्ते य दीवे य ॥ निथिनी को लेने से इंकार नहीं कर देतीं। अन्य समनोज्ञ, शय्यातर, गृह से निर्गत, वटगृहिक, जंबूगृहिक, धार्मिक, अमनोज्ञ जो सर्वसंख्या में चार होते हैं, उनमें से किसी एक स्थान गुडवणिक्, हरितोपलिप्त, दीप-यह द्वारगाथा है। इसका विस्तार पर उसको देना चाहिए। जैसे पहला स्थान है-अपनी श्रमणियां, आगे। दूसरा है गच्छवर्ती श्रमणियां, तीसरा है अन्य सांभोगिक २८८१. नवघरकवोतपविसण, दोण्हं नेमित्ति जुगव पुच्छा य। श्रमणियां और चौथा है असांभोगिक श्रमणियां। अण्णोण्णस्स घराई, पविसध नेमित्तिओ भणति।। २८७६. समणुण्णमणुण्णाणं, संजत तह संजतीण चउरो य। २८८२. आदेसागमपढमा, भोत्तुं लज्जाए गंतु गुरुकहणं। पासत्थिममत्तादि व, अद्धाणादि व्व जे चउरो॥ सो जइ करेज्ज वीसुं, संभोगं एत्थ सुत्तं तु॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org ना Jain Education International
SR No.001944
Book TitleSanuwad Vyavharbhasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2004
Total Pages492
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, G000, & G005
File Size14 MB
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