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________________ श्रीमद्राजचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् [द्वितीय अधिकार कुलपर्वताः कथ्यन्ते-दक्षिणदिग्भागमादीकृत्य हिमवन्महाहिमवनिषधनीलरुक्मिशिखरिसंज्ञा भरतादिसप्तक्षेत्राणामन्तरेषु पूर्वापरायताः षट् कुलपर्वताः भवन्ति । पर्वता इति कोऽर्थः ? वर्षधरपर्वताः सीमापर्वता इत्यर्थः। तेषां पर्वतानामुपरि क्रमेण ह्रदा कथ्यन्ते। पद्ममहापद्मतिगिच्छकेसरिमहापुण्डरीकपुण्डरीकसंज्ञा अकृत्रिमा षट् ह्रदा भवन्ति । ह्रदा इति कोऽर्थः ? सरोवराणीत्यर्थः। तेभ्यः पद्मादिषहदेभ्यः सकाशादागमकथितक्रमेण निर्गता याश्चतुर्दश महानद्यस्ताः कथ्यन्ते । तथाहि - हिमवत्पर्वतस्थपद्मनाममहाहदादर्धकोशावगाहक्रोशार्धाधिकषट्योजनप्रमाणविस्तारपूर्वतोरणद्वारेण निर्गत्य तत्पर्वतस्यैवोपरि पूर्वदिग्विभागेन योजनशतपञ्चकं गच्छति ततो गङ्गाकूटसमीपे दक्षिणेन व्यावृत्य भूमिस्थकुण्डे पतति तस्माद् दक्षिणद्वारेण निर्गत्य भरतक्षेत्रमध्यमभागस्थितस्य दीर्घत्वेन पूर्वापरसमुद्रस्पशिनो विजयार्द्धस्य गुहाद्वारेण निर्गत्य तत आर्यखण्डार्द्धभागे पूर्वेण व्यावृत्य प्रथमावगाहापेक्षया दशगुणेन गव्यूतिपञ्चकावगाहेन तथैव प्रथमविष्कम्भापेक्षया दशगुणेन योजनार्द्धसंहितद्विषष्टियोजनप्रमाणविस्तारेण च पूर्वसमुद्रे प्रविष्टा गङ्गा । तथा गङ्गावसिन्धुरपि तस्मादेव हिमवत्पर्वतस्थपद्मदात्पर्वतस्यैवोपरि पश्चिमद्वारेण निर्गत्य पश्चाद्दक्षिणदिग्विभागेनागत्य विजया गुहाद्वारेण निर्गत्यार्यखण्डा भागे पश्चिमेन व्यावृत्य पश्चिमसमुद्रे प्रविष्टेति । एवं दक्षिणदिग्विभागसमागतगङ्गासिन्धुभ्यां पूर्वापरायतेन विजया पर्वतेन च षट्खण्डीकृतं भरतक्षेत्रम् । अथवा जनपद अर्थका ग्रहण है। उन क्षेत्रोंको भिन्न-भिन्न करनेवाले जो छः कुलपर्वत (कुलाचल) हैं उनके नाम कहते हैं-दक्षिण दिशाके भागको आदि लेकर हिमवत् १ महाहिमवत् २ निषध ३ नील ४ रुक्मी ५ और शिखरी ६, इन नामोंके धारक, पूर्व पश्चिम लंबे कुलपर्वत उन भरत आदि सप्त क्षेत्रोंके बीच में हैं। पर्वत इसका अर्थ वर्षधरपर्वत अथवा सीमापर्वत है। उन पर्वतोंके ऊपर क्रमसे जो ह्रद हैं वे कहे जाते हैं-पद्म १ महापद्म २ तिगिछ ३ केसरी ४ महापुंडरीक ५ और पुंडरीक ६ इन नामोंवाले अकृत्रिम षट् हद हैं। ह्रदका अर्थ सरोवर है। अब उन पद्म आदि ६ ह्रदोंसे आगममें कहे हुए क्रमके अनुसार जो चौदह महानदियाँ निकली हैं उनका वर्णन करते हैं। वे इस प्रकार हैं-हिमवत् पर्वतपर स्थित जो पद्मनामक महाह्रद है उससे अर्ध कोस प्रमाण गहराई और साढ़े छः योजन प्रमाण चौड़ाईको धारक गंगा नामक नदी पूर्वतोरण द्वारसे निकलकर, उसी हिमवत् पर्वतके ऊपर पूर्व दिशामें पाँचसौ योजनतक जातो है; फिर वहाँसे गंगाकूटके पास दक्षिण दिशाको मुड़कर, भूमिमें स्थित जो कुण्ड है उसमें वह गंगा गिरती है, वहाँसे दक्षिण द्वार ( दरवाजे ) से निकलकर, भरत क्षेत्रके मध्यभागमें स्थित जो लंबाईसे पूर्व पश्चिम समुद्रको स्पर्शित करनेवाला विजयार्द्ध पर्वत है उसकी गुहाके द्वारसे निकलकर, वहाँसे आर्यखण्डके अर्धभागमें पूर्वसे लौटकर, प्रथम अवगाहकी अपेक्षा दशगुणी अर्थात् ५ गव्यूति ( कोस ) की गहराई और इसी प्रकार प्रथमके विष्कंभसे दशगुण जो साढ़े बासठ योजन प्रमाण विस्तार है उस सहित गंगानदी पूर्व समुद्रमें प्रवेश करती है। और इस गंगाको भाँति सिन्धुनामक महानदी भी उसी हिमवत्पर्वतपर विद्यमान पद्मह्रदके पश्चिमद्वारसे निकलकर, पर्वतपर ही गमन करके फिर दक्षिण दिशाको आकर, विजया - की गुहाके द्वारसे निकलकर, पश्चिमको मुड़कर, आर्यखंडके अर्द्धभागमें आकर, पश्चिम समुद्र में प्रवेश करती है । इस प्रकार दक्षिण दिशाको आयी हुई जो गंगा और सिंधु नामक दो नदियाँ हैं, इनसे और पूर्व तथा पश्चिमके समुद्रतक लम्बा जो विजयार्द्ध पर्वत है उससे षट् खण्ड (छ: विभागोंमें बटा) हुआ भरत क्षेत्र है ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001919
Book TitleBruhaddravyasangrah
Original Sutra AuthorNemichandrasuri
AuthorManoharlal Shastri
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year
Total Pages228
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Principle, & Philosophy
File Size20 MB
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