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________________ ३२ सपरितोसं पडिहारीए-महाराय ! देवी वसन्तसेणा तुम्हाणं अम्भुदयनिमित्तं पयाणं भागधेएहिं सुहसुहेणं दारयं पसूय त्ति।। तओ राइणा पुत्तजम्मब्भुदयसंजायरोमंचेणं दाऊण पडिहारीए कडयकेऊर' कण्णालंकाराइयं अंगाभरणं, दिन्ना समाणत्ती। वसुंधरे ! समाइससुणं मम वयणाओ जहासन्निहिए पडिहारे। जहा-मोयावेह कालघंटापओएण मम रज्जे सव्वबंधणाणि, दवावेह घोसणापुव्वयं अणवेक्खियाणरूवं महादाणं, विसज्जावेह जियसत्तुप्पमुहाणं नरवईणं मम पुत्तजम्मपउत्ति, निवेएह देवपुत्तजम्मभुदयं पउराणं, कारावेह अयालच्छणभूयं नयरमहूसवं ति । समाइट्ठा य तीए जहाइट्ठ पडिहारा। अणुचिट्ठियं च रायसासणं पडिहारेहिं । अवि य काराश्यिं च तेहि तूररवष्पप्णदसदिसाभोयं । उन्नामिएक्ककरयलनच्चन्तबिलासिणिसमहं ॥५२॥ पजया सपरितोषं प्रतीहार्या–महाराज ! देवी वसन्तसेना युष्माकं अभ्युदयनिमित्तम्, प्रजानां भागधेयैः सुखसुखेन दारकं प्रसूतेति । ततो राज्ञा पुत्रजन्माभ्युदयसंजात रोमाञ्चेन दत्त्वा प्रतीहार्य कटक-केयूरकर्णालङ्कारादिकम्अङ्गाभरणम, दत्ता समाज्ञप्तिः । वसुन्धरे ! समादिश मम वचनाद् यथासन्निहितान् प्रतीहारान, यथा मोचयत कालघण्टाप्रयोगेण मम राज्ये सर्वबन्धनानि, दापयत घोषणापूर्वकम्' अनपेक्षितानुरूपं महादानम्, विसर्जयत जितशत्रूप्रमुखानां नरपतीनां मम पुत्रजन्मप्रवृत्तिम्, निवेदयत देवीपुत्रजन्माभ्यदयं पौराणाम, कारयत अकालक्षणभूतं नगरमहोत्सवमिति । समादिष्टाश्च तथा यथादिष्टं प्रतीहाराः । अनुचेष्टितं च राजशासनं प्रतीहारैः। अपि च कारितं च तैः तूर्यरवउत्पन्नदशदिशाभोगम् । उन्नामितैक-करतलनृत्यमांनविलासिनीसमूहम् ॥५२॥ "महाराज ! देवी वसन्तसेना ने प्रजा के सौभाग्य से एवं आपके अभ्युदय के कारणभूत पुत्र को सुखपूर्वक जन्म दिया है।" .. तब राजा ने प्रतीहारी को कड़ा, बाजूबन्द, कर्णालंकार आदि आभूषण दिये। पुत्रजन्म के अभ्युदय - से राजा को रोमांच हो आया था। उसने आज्ञा दी, "वसुन्धरा ! मेरे कथनानुसार समीपस्थ द्वारपालों को आज्ञा दो कि घण्टा बजाकर मेरे राज्य के समस्त बन्दियों को छोड़ दिया जाय, घोषणापूर्वक अपेक्षा से भी अधिक महादान दिया जाय। मेरे पुत्र-जन्म के उपलक्ष्य में जितशत्रु प्रमुख राजाओं को लौटा दें। नगरनिवासियों को देवी के पूर्वजन्म सम्बन्धी समाचार निवेदन कर दें। असामयिक हर्षवाला नगर-महोत्सव मनाया जाय।" उस (प्रतिहारी) ने द्वारपालों को जो आज्ञा दी थी वह कह सुनायी। द्वारपालों ने राजा की आज्ञा का अनुवर्तन किया। और भी उन्होंने मनोभिराम बधाई का उत्सव कराया। उस समय बाजों का दशों दिशाओं में व्याप्त होने वाला शब्द हो रहा था। एक हथेली ऊपर उठाये हुए स्त्रियों का समूह नृत्य कर रहा था। अन्तःपुर की स्त्रियाँ 1. केउर। For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001881
Book TitleSamraicch Kaha Part 1
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
AuthorRameshchandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1993
Total Pages516
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Story, & literature
File Size13 MB
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