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________________ १२६ परमात्मप्रकाश क्षेत्रपालकी पूजाका बहुत प्रचार रहा है । दक्षिणमें कुमारसेन नामके कई साधु हुए हैं । मुलगुन्द मंदिरके शिलालेखमें, जो ९०३ ई० से पहलेका है, एक कुमारसेनका उल्लेख है; तथा ११४५ ई. के बोगदीके शिलालेखमें एक कुमारस्वामीका नाम आता है । किन्तु एकताके लिये केवल नामकी समता ही पर्याप्त नहीं है । अतः इन बातोंको दृष्टिमें रखते हुए मैं कुमारका कोई निश्चित समय ठहराना नहीं चाहता, किन्तु केवल इतना ही कहना है कि परम्पराके आधारपर कल्पित कुमारकी प्राचीनता प्रमाणित नहीं होती तथा उसके विरुद्ध अनेक जोरदार युक्तियाँ मौजूद हैं । मेरा मत है कि जोइन्दु और कुमारमेंसे जोइन्दु प्राचीन हैं । (९) प्राकृतलक्षणके कर्ता चण्डने अपने सूत्र ‘यथा तथा अनयोः स्थाने' के उदाहरणमें निम्नलिखित दोहा उद्धृत किया है कालु लहेविणु जोइया जिम जिम मोहु गलेइ । तिम तिम दंसणु लहइ जो णियमें अप्पु मुणेइ ॥ यह परमात्मप्रकाशके प्रथम अधिकारका ८५ वाँ दोहा है । दोनोंमें केवल इतना ही अन्तर है कि परमात्मप्रकाशमें 'जिम' के स्थानपर 'जिमु', 'तिम' के स्थानपर 'तिमु' तथा 'जो' के स्थानपर 'जिउ' पाठ है, किन्तु चण्डका प्राकृत-व्याकरण अपनी असली हालतमें नहीं है । यह एक सुव्यवस्थित पुस्तक न होकर एक अर्धव्यवस्थित नोटबुकके जैसा है | १८८०.ई० में जब प्राकृतका अध्ययन अपनी बाल्यावस्था था, और अपभ्रंश-साहित्यसे लोग अपरिचित थे, हॅन्लें (Hoernle) ने इसका सम्पादन किया था। उनके पास साधनोंकी कमी थी, और केवल पालीभाषा तथा अशोकके शिलालेखोंपर दृष्टि रखकर उसका व्यवस्थित संस्करण सम्पादित कर सकना कठिन था । हॅन्लेंने उसके सम्पादनमें बडी कडाईसे काम लिया है, और ऐसी कडाईके लिये उन्होंने कैफियत भी दी है । किन्तु पिशेल तथा गुणे इसकी शिकायत करते हैं । इसी कडाईने उनसे उक्त सूत्र तथा उसके उदाहरणको मूलसे पृथक् कराके परिशिष्टमें डलवा दिया है । २हॅन्हेंका कहना है कि लेखकोंकी कृपासे यह सूत्र मूलमें आ मिला है । वे कहते हैं कि व्याकरणके जिस प्रसंगमें उक्त सूत्र अपने उदाहरणके साथ आता है, वह व्यवस्थित नहीं है । उनके इस मतसे हम भी सहमत हैं । किन्तु इस बातका स्मरण रखते हुए कि सूत्रोंके क्रममें परिवर्तन किया गया है, हम उसकी मौलिकताको अस्वीकार नहीं कर सकते । चण्ड एक अपभ्रंश भाषासे परिचित हैं, जिसमें र, जब वह किसी शब्दमें द्वितीय व्यञ्जनके रूपमें आता है, सरक्षित रहता है। अपभ्रंश भाषामें यह बात पाई जाती है: हेमचन्द्रके कछ उदाहर उदाहरणोंमें तथा रुद्रटके श्लेष-पद्योंमें भी इस बातको चित्रित किया गया है । हमें आशा है कि केवल एक सूत्रके द्वारा चण्डने अपभ्रंशका पृथक्करण न किया होगा । अतः अन्य सूत्रोंको भी चण्डकृत स्वीकार करनेपर अपभ्रंशके सम्बन्धमें अधिक जानकारी हो जाती है | यह स्वाभाविक है कि अपने सूत्रोंके उदाहरणमें वैयाकरण काव्यग्रन्थोंसे पद्य उद्धृत करते हैं । हेमचन्द्रके व्याकरणमें उक्त पद्यका न पाया जाना निरर्थक नहीं है । यह इस बातका निराकरण करता है कि हेमचन्द्रके व्याकरणसे लेकर लेखकोंने उसे यहाँ मिला दिया होगा । गुणेका कहना है कि यह सूत्र मूलग्रन्थका ही है और हम इससे सहमत हैं । ___ चण्डके समयके बारेमें अनेक मत हैं | हॅन्लेंका कहना है कि ईसासे तीन शताब्दी पूर्वके कुछ बाद और ईस्वी सन्के प्रारम्भसे पहले चण्डका व्याकरण रचा गया है । हॅन्लेंके अनुसार उक्त सूत्र तथा उसके उदाहरण वररुचिसे भी बादमें ग्रन्थमें सम्मिलित किये गये हैं किन्तु कितने बादमें सम्मिलित किये गये हैं, यह वह नहीं बताते हैं । वररुचिका समय ५०० ई. के लगभग बतलाया जाता है । गुणेका कहना है कि चण्ड उस समय हुए हैं, जब अपभ्रंश केवल आभीरोंके बोलचालकी भाषा न थी बल्कि साहित्यिक भाषा हो चुकी थी, अर्थात् १ दलाल और गुणे लिखित 'भविसयत्तकहा' की प्रस्तावना, पृ० ६२ । २ हॅन्लें की प्रस्तावना, पृ० १, २०, आदि । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001876
Book TitleParmatmaprakasha and Yogsara
Original Sutra AuthorYogindudev
AuthorA N Upadhye
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year2000
Total Pages550
LanguageSanskrit, Hindi, English
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size13 MB
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