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________________ १९४] लोकविभागः [१०.१७२परिवारः सहस्र द्वे लान्तवस्याङ्गनास्वपि । वल्लभास्तु सहस्रार्ध पूर्ववद्विगुणविक्रियाः ॥१७२ । १२८००० । सर्वा १६५००। कापित्थे लान्तवस्येव तस्यार्धं शुक्रयोषितः । परोवारः सहस्रं तु शते सार्धं च वल्लभाः॥१७३ ।८२५०। तयव स्यान्महाशुक्रे विक्रियाः द्विगुणा द्वयोः । अष्टावष्टौ महादेव्यः एतयोरपि भाषिताः ॥१७४ । २५६०००। सहस्रार्धं परीवारः शतारस्याग्रयोषितः। पञ्चविंशं शतं चापि वल्लभास्तस्य कीर्तिताः ॥१७५ ।१२५ । सर्वाः ४१२५ । द्विगुणा वित्रिया चात्र सहस्रारेऽपि तादृशाः । सरूपाणां पुनश्चासामर्धमानतयोषितः ॥१७६ ।५१२०००। २०६३। शतद्वयं पुनः सार्धं परिवारोऽग्रयोषिताम् । २ त्रिषष्टिवल्लभा द्विगुणा विक्रिया आरणे तथा ॥१७७ ।२५०।६३।१०२४०००। सौधर्मदेवीनामानि दक्षिणेन्द्राग्रयोषिताम् । ईशानदेवीनामानि उत्तरेन्द्राग्रयोषिताम् ॥१७८ षड्युग्मशेषकल्पेषु आदिमध्यान्तवतिनाम् । देवीनां परिषदां संख्या कथ्यते च यथाक्रमम् ॥१७९ ___ लान्तव इन्द्रकी अग्रदेवियोंमें प्रत्येकका परिवार दो हजार (२०००)है । उसकी वल्लभा देवियां पांच सौ (५००) हैं । वे पूर्वके समान दूनी (१२८०००) विक्रिया करती हैं। (२०००४८)+५००=१६५०० सब देवियां ॥१७२॥ कापिष्ठ इन्द्रकी देवियोंका वर्णन लान्तव इन्द्रके समान है । शुक्र इन्द्रकी देवियां उससे आधी ( ८२५०) हैं । उसकी अग्रदेवियोंका परिवार एक एक हजार (१०००-१०००) और वल्लभा देवियां दो सौ पचास (२५०) हैं ॥ १७३ ।। उसी प्रकार महा शुक्र इन्द्र की भी देवियोंका प्रमाण (८२५०) है। उन दोनों इन्द्रोंकी अग्रदेवियां पूर्वसे दूनी (२५६०००) विक्रिया करती हैं। इनके भी आठ आठ महादेवियां कही गई हैं ॥ १७४ ।। शतार इन्द्रकी प्रत्येक अग्रदेवीका परिवार पांच सौ (५००) है। उसकी वल्लभा देवियां एक सौ पच्चीस (१२५) कही गई हैं --(५००४८) +१२५=४१२५ सब देवियां ।। १७५ ।। यहां विक्रियाका प्रमाण पहिलसे दूना (५१२०००) है । उक्त देवियां इसी प्रकार (४१२५) सहस्रार इन्द्र के भी हैं । सुन्दर रूपवाली इन देवियोंके अर्ध भाग प्रमाण देवियां आनत इन्द्रके हैं -(२५०४८)+६३ २०६३ आनतदेवियां । उसकी अग्रदेवियोंका परिवार दो सौ पचास (२५०) है । वल्लभा देवियां उसकी तिरेसठ (६३) हैं। विक्रिया पूर्वकी अपेक्षा यहां दूनी (१०२४०००) है। आरण इन्द्रकी देवियोंकी प्ररूपणा आनत इन्द्रके समान हैं ।।१७६-७७।। जो नाम सौधर्म इन्द्रकी अग्रदेवियोंके कहे गये हैं वे ही नाम सब दक्षिण इन्द्रोंकी अग्रदेवियोंके हैं । इसी प्रकार ईशान इन्द्रकी अग्रदेवियोंके जो नाम निदिष्ट किये गये हैं वे ही नाम सब उत्तर इन्द्रोंकी अग्रदेवियोंके हैं ।। १७८ ॥ ___ अब यहां छह युगलों और शेष चार कल्पोमें क्रमसे आदि, मध्य और अन्तिम परिषद्में रहनेवाले पारिषद देवोंकी देवियोंकी संख्या कही जाती है- पांच सौ, छह सौ, सात सौ ; चार सौ, १५ योषिताम् । २ आप त्रिषष्टि । For Private & Personal Use Only Jain Education International www.jainelibrary.org
SR No.001872
Book TitleLokvibhag
Original Sutra AuthorSinhsuri
AuthorBalchandra Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year2001
Total Pages312
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Literature, & Geography
File Size22 MB
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