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में उसे प्रचलित करावें । इसमें बड़े भारी प्रयास की आवश्यकता पड़ेगी । अनायास ही यह प्रथा नहीं टूट सकेगी कि जैनी हिन्दू डिस्सेन्टर हैं और हिन्दू-लॉ के पाबन्द हैं जब तक वह कोई विशेष रिवाज साबित न कर दें। इसके सिवा कुछ ऐसे मनुष्य भी होंगे जो जैन-लॉ के प्रचार में अपनी हानि समझेंगे । और कुछ लोग तो योंही 'नवीन' आन्दोलन के विरुद्ध रहा करते हैं । ये गुलामी में आनन्द मानने के लिये प्रस्तुत होंगे। किन्तु इन दोनों प्रकार के महाशयों की संख्या कुछ अधिक नहीं होनी चाहिए । यद्यपि ऐसे सज्जन बहुत से निकलेंगे जिनके लिए यह विषय अधिक मनोरञ्जक न हो । यदि सर्व जैन जाति अर्थात् दिगम्बरी, श्वेताम्बरी और स्थानकवासी तीनों सम्प्रदाय मिलकर इस बात की चेष्टा करेंगे कि जैन-लॉ प्रचलित हो जाय तो कोई कारण दिखाई नहीं पड़ता कि क्यों ऐसा न हो, यद्यपि प्रत्यक्षतया यह विषय आसानी से सिद्ध न होगा | ( ४ ) यदि हम निम्नलिखित उपायों का अवलम्बन करें तो अनुमानत: शीघ्र सफल हो सकते हैं
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( क ) प्रत्येक सम्प्रदाय को अपनी अपनी समाजों में प्रथमत: इस जैन-लॉ के पक्ष में प्रस्ताव पास कराने चाहिएँ । प्रत्येक समाज के नेताओं की प्रस्तावों पर स्वीकृति प्रदान
( ख ) फिर एक स्थान पर
एक सभा करके उन करनी चाहिए ।
ग) जो सज्जन किसी कारण से जैन-लॉ के नियमों को अपनी इच्छाओं के विरुद्ध पावें वे अपनी इच्छाओं की पूर्ति वसीयत के द्वारा कर सकते हैं । इस भाँति धर्म और जाति की स्वतन्त्रता भी बनी रहेगी और उनकी मानसिक इच्छा की पूर्ति भी हो जायगी ।
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