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________________ पद्मपुराणे सम्प्रयुज्य समीरास्त्रमनक्रमविपश्चिता । सौमित्रिणा परिध्वंसं तमीतं क्षणमात्रतः ॥१०॥ भूयः श्रेणिक संरम्भस्फुरिताननतेजसा । रावणेनास्त्रमाग्नेयं क्षिप्तं ज्वलितसर्वदिक ॥१०२॥ लक्ष्मीधरेण तश्चापि वारुणास्त्रप्रयोगतः । निर्वापितं निमेषेण स्थितं कार्यविवर्जितम् ॥१०३॥ कैकयेयस्ततः पापम चिक्षेप रक्षसि । रक्षसा तच्च धर्मास्त्रप्रयोगेण निवारितम् ॥१०॥ ततोऽस्वमिंधनं नाम लक्ष्मणेन प्रयुज्यते । इन्धनेनैव तन्नीतं रावणेन हतार्थताम् ॥१५॥ फलासारं विमुञ्चभिः प्रसूनपल्लान्वितम् । गगनं वृक्षसंघातैरत्यन्तगहनीकृतम् ॥१०॥ भूयस्तामसवाणीधैरन्धकारीकृताम्बरैः । लचमीधरकुमारेण छादितो राक्षसाधिपः ॥१०७॥ सहस्रकिरणास्त्रेण तामसास्त्रमपोह्य सः । प्रायुक्त दन्दशकास्त्रं विस्फुरत्फणमण्डलम् ॥१०८॥ ततस्तार्यसमात्रेण लचमणेन निराकृतम् । पन्नगास्त्रं नभश्चाभूद्धेमभासेव पूरितम् ॥१०॥ संहाराम्बुद निर्घोषमुरगास्त्रमथो पुनः । पद्मनाभानुजोऽमुञ्चद् विषाग्निकणदुःसहम् ॥११०॥ बहणास्त्रेण तद्धीरस्निकूटेन्दुरसारयत् । प्रायोक्षीच दुरुत्सारमस्त्रं विनंविनायकम् ॥११॥ विसृष्टे तत्र विघ्नास्त्रे वान्छितच्छेदकारिणि । प्रयोगे त्रिदशास्त्राणां लचमणो मोहमागमत् ॥११२॥ वज्रदण्डान् शरानेव विससर्ज स भूरिशः । रावणोऽपि शरैरेव स्वभावस्थैरयुध्यत ॥१३॥ भाकर्णसंहतैर्वाणैरासीधुद्धं तयोः समम् । लक्ष्मीभृद्रक्षसोोरं त्रिपृष्ठययिकण्ठयोः ॥११॥ वाला माहेन्द्र शस्त्र छोड़ा ॥१००।। इधरसे शस्त्रोंका क्रम जानने में निपुण लक्ष्मणने पवन वाणका प्रयोगकर उसके उस माहेन्द्र शस्त्रको क्षणभरमें नष्ट कर दिया ॥१०१॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! क्रोधसे जिसके मुखका तेज दमक रहा था ऐसे रावणने फिर आग्नेय वाण चलाया जिससे समस्त दिशाएँ देदीप्यमान हो उठीं ॥१०२॥ इधरसे लक्ष्मणने वारुणास्त्र चलाकर उस आग्नेय वाणको, वह कार्य प्रारम्भ करे कि उसके पर्व ही निमेष मात्रमें, बझा दिया ॥१०३।। तदनन्तर लक्ष्मणने रावणपर पाप नामका शस्त्र छोड़ा सो उधरसे राबणने धर्म नामक शस्त्रके प्रयोगसे उसका निवारण कर दिया ॥१०४॥ तत्पश्चात् लक्ष्मणने इन्धन नामक शस्त्रका प्रयोग किया जिसे रावणने इन्धन नामक शस्त्रसे निरर्थक कर दिया ॥१०॥ तदनन्तर रावणने फल और फूलोंकी वर्षा करनेवाले वृक्षोंके समूहसे आकाशको अत्यन्त व्याप्त कर दिया ॥१०६॥ तब लक्ष्मणने आकाशको अन्धकार युक्त करनेवाले तामसवाणोंके समूहसे रावणको आच्छादित कर दिया ॥१०७॥ तदनन्तर रावणने सहस्रकिरण अस्त्रके द्वारा तामस अस्त्रको नष्ट कर जिसमें का समह उठ रहा था ऐसा दन्दशक अस्त्र चलाया ॥१०८॥ तत्पश्चात इधरसे लक्ष्मणने गरुड़वाण चलाकर उस दन्दशूक अस्त्रका निराकरण कर दिया जिससे आकाश ऐसा हो गया मानो स्वर्णकी कान्तिसे ही भर गया हो ॥१०६।। तदनन्तर लक्ष्मणने प्रलयकालके मेघके समान शब्द करनेवाला तथा विषरूपी अग्निके कणोंसे दुःसह उरगान छोड़ा ॥११०॥ जिसे धीर वीर रावणने वहणास्त्रके प्रयोगसे दूर कर दिया और उसके बदले जिसका दूर करना अशक्य था ऐसा विघ्नविनाशक नामका शस्त्र छोड़ा ॥१११।। तदनन्तर इच्छित वस्तुओं में विघ्न डालनेवाले उस विघ्नविनाशक शस्त्रके छोड़नेपर लक्ष्मण देवोपनीत शस्त्रोंके प्रयोग करने में मोहको प्राप्त हो गये अर्थात उसे निवारण करनेके लिए कौन शस्त्र चलाना चाहिये इसका निर्णय नहीं कर सके ॥११२।। तब वे केवल वनमय दण्डोंसे युक्त वाणोंको ही अधिक मात्रामें घलाते रहे और रावण भी उस दशामें स्वाभाविक वाणोंसे हो युद्ध करता रहा ॥११३।। उस समय लक्ष्मण और रावणके बीच कान तक खिंचे वाणोंसे ऐसा भयंकर युद्ध हुआ जैसा कि पहले त्रिपृष्ठ और अश्वग्रोवमें हुआ था ॥११४॥ १. विघ्नमनायकम् म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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