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________________ विषयानुक्रमणिका छयासठवाँ पर्व जब विशल्या के प्रभाव से लक्ष्मण की शक्ति निकल जाने का समाचार रावण को मिलता है तो वह ईर्ष्यालु हो मन्दहास्य करने लग जाता है। मृगाङ्क आदि मन्त्रियों रावण को समझाते हैं कि सीता को वापस कर राम के साथ सन्धि कर लेना ही उचित है। रावण मन्त्रियों के समक्ष तो कह देता है कि जैसा आप लोग कहते हैं वैसा ही करूँगा; परन्तु जब दूत भेजा जाता है तब उसे संकेत द्वारा कुछ दूसरी ही बात समझा देता है। दूत, राम के दरबार में पहुँचकर रावण की प्रशंसा करता हुआ उसके भाई और पुत्रों को छोड़ देने की प्रेरणा देता है। राम उत्तर देते हैं कि मुझे राज्य की आवश्यकता नहीं। मैं सीता को लेकर वन में विचरूँगा, रावण पृथ्वी का उपभोग करे। दूत पुनः रावण के पक्ष का समर्थन करता है। यह देख, भामण्डल का क्रोध उबल पड़ता है। वह इनको मारने के लिए तैयार होता है पर लक्ष्मण उसे शान्त कर देते हैं। दूत वापस आकर रावण को सब समाचार सुनाता है। १-८ सड़सठवाँ पर्व दूत की बात सुनकर रावण पहले तो किंकर्तव्यविमूढ़-सा हो जाता है पर बाद में बहुरूपिणी विद्या सिद्ध करने का निश्चय कर पुलकित हो उठता है। वह उसी समय किंकरों को शान्ति-जिनालय को सुसज्जित करने का आदेश देता है। साथ ही यह आदेश भी देता है कि नगर के समस्त जिनालयों में जिनदेव की पूजा की जाए। प्रसंगवश सर्वत्र स्थित जिनालयों का वर्णन। ६-११ __ अड़सठवाँ पर्व फाल्गुन शुक्ला अष्टमी से पूर्णिमा तक नन्दीश्वर पर्व आ जाता है। उसके माहात्म्य का वर्णन। दोनों सेनाओं के लोग पर्व के समय युद्ध नहीं करने का निश्चय करते हैं। रावण भी शान्ति जिनालय में भक्ति-भाव से जिनेन्द्र भगवान् की पूजा करता है। १२-१३ उनहत्तरवाँ पर्व रावण, शान्ति जिनालय में जिनेन्द्रदेव के सम्मुख विद्या सिद्ध करने के लिए आसनारूढ़ होता है। रावण की आज्ञा के अनुसार, मन्दोदरी यमदण्ड मन्त्री को आदेश देती है कि जब तक पतिदेव विद्या-साधन में निमग्न हैं तब तक सब लोग शान्ति से रहें और उनकी हितसाधना के लिए नाना प्रकार के नियम ग्रहण करें। १४-१५ सत्तरवाँ पर्व रावण बहुरूपिणी विद्या सिद्ध कर रहा है-यह समाचार जब राम की सेना में सुनाई पड़ा तब सब चिन्ता में निमग्न हो जाते हैं। यह विद्या चौबीस दिन में सिद्ध होती है। यदि विद्या सिद्ध हो गयी तो रावण अजेय हो जाएगा' यह विचार कर लोग विद्या सिद्ध करने में उपद्रव करने का निश्चय करते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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