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________________ त्रिसप्ततितमं पर्व तावताशङ्कयते नाथ वक्तुं तत्त्वं हिते रतम् । यावत्प्रज्ञापनीयस्य निश्चयान्तो न दृश्यते ।।१०३।। तत्कार्य बुद्धियुक्तन परत्रेह च यत्सुखम् । न तु दुखाङ्कुरोल्पत्ति कारणं कुरसनास्पदम् ।।१०४।। विषयैः सुचिरं भुक्तर्यः पुस्तृिप्तिमागतः । त्रैलोक्येऽपि वदै तं पापमोहित रावण ॥१०५।। भुक्त्वापि सकलं भोगं मुनित्वं चेन्न सेवसे । गृहिधर्मरतो भूत्वा कुरु दुःखविनाशनम् ।।१०६॥ अणुव्रतासिदीप्ताङ्गो नियमच्छत्रशोभितः । सम्यग्दर्शनसनाहः शीलकेतनलक्षितः ।।१०७॥ भावनाचन्दनाङ्गः सुप्रबोधशरासनः । वशेन्द्रियबलोपेतः शुभध्यानप्रतापवान् ॥१०॥ मर्यादांकुशसंयुक्तो निश्चयानेकपस्थितः । जिनभक्तिमहाशक्तिर्जय दुर्गतिवाहिनीम् ॥१०॥ इयं हि कुटिला पापा महावेगा सुदुःसहा । बुधेन जीयते जित्वा तामेतां सुखितो भव ॥१०॥ हिमवन्मन्दरायेषु पर्वतेषु जिनालयान् । पूजयन् वशया साद्धं जम्बूद्वीपं मया चर ॥११॥ अष्टादशसहस्रस्त्रीपाणिपल्लवलालितः । क्रीड मन्दरकुजेषु मन्दाकिन्यास्तटेषु च ॥११२॥ ईप्सितेषु प्रदेशेषु रमणीयेषु सुन्दर । विद्याधरयुगं स्वेच्छं करोति विहृतिं सुखम् ॥११३॥ लब्धवर्ण न युद्धेन किञ्चिदस्ति प्रयोजनम् । प्रसीद कुरु मे वाक्यं सर्वथैव सुखावहम् ॥११॥ चवेडवर्जनं निंद्य परमानर्थकारणम् । जनवादमिमं मुञ्च किं मजस्ययशोबुधौ ॥११५॥ इति प्रसादयन्ती सा बद्धपाण्यब्जकुमला । पपात पादयोस्तस्य वांछन्ती परमं हितम् ॥११६॥ हो ॥६६-१०२॥ हे नाथ ! हित करनेमें तत्पर तत्त्वका निरूपण करनेके लिए तब तक आशंका की जाती है जब तक कि निरूपणादि तत्त्वका पूर्ण निश्चय नहीं दिखाई पड़ता है ।।१०३।। बुद्धिमान् मनुष्यको वह कार्य करना चाहिए जो इस लोक तथा परलोकमें सुखका देनेवाला हो । दुःखरूपी अङ्करको उत्पत्तिका कारण तथा निन्दाका स्थान न हो ॥१०४॥ चिरकाल तक भोगे हुए भोगोंसे जो तृप्तिको प्राप्त हुआ हो ऐसा तीन लोकमें भी यदि कोई एक पुरुष हो तो हे पापसे मोहित रावण ! उसका नोम कहो ॥१०५॥ यदि समस्त भोगोंको भोगनेके बाद भी तुम मुनि पदको धारण नहीं कर सकते हो तो कमसे कम गृहस्थ धर्ममें तत्पर होकर भी दुःखका नाश करो ॥१०६।। हे नाथ ! अणुव्रत रूपी तलवारसे जिसका शरीर देदीप्पमान है, जो नियमरूपी छत्रसे सुशोभित है, जिसने सम्यग्दर्शन रूपी कवच धारण किया है, जो शीलवत रूपी पताकासे युक्त है, जिसका शरीर भावनारूपी चन्दनसे आद्र है। सम्यग्ज्ञान ही जिसका धनुष है, जो जितेन्द्रियता रूपी वलसे सहित है, शुभध्यान रूपी प्रतापसे युक्त है, मर्यादा रूपी अङ्कशसे सहित है, जो निश्चय रूपी हाथी पर सवार है, और जिनेन्द्र भक्ति हो जिसकी महाशक्ति है ऐसे होकर तुम दुर्गति रूपी सेनाको जीतो। यथार्थमें यह दुर्गति रूपी सेना अत्यन्त कुटिल, पापरूपिणी, और अत्यन्त दुःसह है सो इसे जीतकर तुम सुखी होओ ॥१०७-११०॥ हिमवत् तथा मेरु आदि पर्वतों पर जो अकृत्रिम जिनालय हैं उनकी मेरे साथ पूजा करते हुए जम्बू द्वोपमें विचरण करो ॥१११।। अठारह हजार स्त्रियों के हस्तरूपी पल्लवोंसे ललित होते हुए तुम मन्दरगिरिके निकुञ्जों और गङ्गा नदीके तटों में क्रीड़ा करो ॥११२।। हे सुन्दर ! विद्याधर दम्पति अपने अभिलषित मनोहर स्थानों में इच्छानुसार सुख पूर्वक विहार करते हैं ।।११३॥ हे विद्वन् ! अथवा हे यशस्विन् ! युद्ध से कुछ प्रयोजन नहीं है। प्रसन्न होओ और सब प्रकारसे सुख उत्पन्न करने वाले मेरे वचन अङ्गीकृत करो ॥११४॥ विषके समान दुष्ट, निन्दनीय, तथा परम अनर्थका कारण जो यह लोकापवाद है सो इसे छोड़ो। व्यर्थ ही अपयश रूप सागरमें क्यों डूबते हो ? ॥११५।। इस प्रकार प्रसन्न करती तथा उसका परम हित चाहती हुई मन्दोदरी हस्तकमल जोड़कर रावणके चरणों में गिर पड़ी ॥११६॥ १. ननु म० । २. पाप म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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